मा मारे तो भी मा ही पुकारे
अपनों की फ़र्याद अपनों ही से की जाती है, अपनों की सख़्ती भी बुरी नहीं लगती, जिस तरह बच्चा मा से कैसा ही पट्टे मगर मा, मा कहता जाएगा
मा मरे माैसी जिये
यानी मा मर जाएगी तो ख़ाला पाल लेगी यानी मा और ख़ाला में कुछ फ़र्क़ नहीं है
माँ बहन पुनना
किसी की माँ और बहन को बुरा भला कहना, किसी की माँ बहन में ऐब निकालना, गालियां देना
माँ डायन बाप ओझा
दोनों एक जैसे अर्थात ऐसे माँ-बाप का लड़का भयंकर तो होगा ही यह भाव छिपा है
माँ का मान भला
माँ संतान का गर्व करे तो बजा है, संतान को माँ का आदर करना चाहिए
माँ मरे मौसी जिये
माँ और मौसी की मोहब्बत में कोई अंतर नहीं, माँ मर जाए तो मौसी बच्चों की देखभाल करती है
माँगी धाड़ है
लोग मुतफ़र्रिक़ इधर उधर के जमा हो गए हैं काम देने वाले नहीं, ग़ैर मुनज़्ज़म जमईयत है, सलीक़े से काम नहीं करसकती
माधौ आया और ख़ाकी समाया
ख़ामोशी से नेक काम कर जाना, नेकी करके ग़ायब होजाना , शौहरत-ओ-सुलह से बेनयाज़ होकर नेक काम करना
माघ नंगी बैसाख भूकी
बहुत ग़रीब, सदा मुफ़लिस, सर्दी में पहनने को कपड़ा नहीं मिलता और गर्मी में पेट भर कर खाने को नहीं मिलता
माल पर ज़कात है
आय पर ख़र्च निर्भर है, आय पर ही दान निर्भर है, हैसियत पर जूता है
माल-ए-'अरब पेश-ए-'अरब
अपना माल अपनी आँखों ही के सामने अच्छा रहता है, अपना माल अपने ही क़ब्ज़े में रहे तो अच्छा है
माल-ए-हराम बूवद बजाए हराम रफ़्त
(फ़ारसी कहावत उर्दू में मुस्तामल) जैसी नाजायज़ कमाई थी वैसी ही नाजायज़ मुद्दों में ख़र्च हुई, नाजायज़ माल जिस तरह आया था इसी तरह चला गया, हराम की कमाई यूंही उड़ जाती है
मालिक ज़िंदा माल मीरास
कोई ज़िंदगी में ही जायदाद से महरूम कर दिया जाये या बदमाश रूबरू ही लूट कर खा जाये तो कहते हैं, बदतमाश का किसी को ज़बरदस्ती लूट या ठग लेना
मान न मान मैं तेरा मेहमान
बिना निमंत्रण किसी के यहाँ जाने, अकारण किसी की बात में हस्तक्षेप करने या बलपूर्वक किसी काम में सम्मिलित होने वाले के लिए बोलते हैं
मा'क़ूल मी शवंद चू मा'ज़ूल मी शवंद
(फ़ारसी कहावत उर्दू में मुस्तामल) जब लोग अपने ओहदे से हटा दिए जाते हैं तो उन्हें अक़ल आजाती है या इंसान जब अपने ओहदे पर नहीं रहता इस में इंसानियत आजाती है
मार के आगे भूत भागता है
मार से भूत भागता है, मार के आगे सब शरारत और कपट दूर हो जाती है, पिटाई से ही दुष्ट ठीक हो जाते हैं
मार पीछे बेद
लड़ाई के बाद बदला लेना कठिन, काम निकल गया, अब क्या आवश्यकता है
मार पीट गुसय्याँ तूरी आस
नौकर मालिक को या बीवी ख़ावंद को कहती ले कि मालिक तो जितना चाहे मुझे मार्ले में तो तेरे भरोसे पर हूँ, हर हाल में भरोसा करना
मारे मरे न काटे कटे
मुश्किल काम जो ख़त्म होने ही को ना आए, ऐसा शख़्स जिस से पीछा छुड़ाना मुश्किल हो
मास बिना सब घास रसोई
बिना माँस के भोजन अच्छा प्रतीत नहीं होता है, माँस के बिना भोजन बे-स्वाद होता है
माट कलाट बिगड़ा है
सब की अक़्ल जाती रही या सारे ख़ानदान को दाग़ लगा, सबके सब बेवक़ूफ़ हो गए हैं
मातल-मुफ़्ती माताल-फ़तवा
मुफ़्ती मर गया फ़तवा मर गया, यानी मरने वाले के साथ उसकी बात ख़त्म हो जाती है, जिसका दौर होता है उसकी बात चलती है
माया के तीन नाम, परसा, परसू, परसराम
इंसान की इज़्ज़त दौलत की वजह से होती है, जब ग़रीब था तो लोग प्रसा कहते थे, जब ज़रा हैसियत बनी तो प्रसव कहने लगे, जब दौलतमंद होगया तो परसराम कहलाने लगा
माया मिली न राम
न दुनिया मिली, न धर्म मिला, न इधर के रहे न उधर के रहे, न ये हाथ आया न वह मिला
मछली तो नहीं कि सड़ जाएगी
अक्सर बेटी की शादी की निसबत बोलते हैं जिस से ये मुराद होती है कि जब तक अच्छा घर और अच्छा बर नहीं मिलेगा हम शादी नहीं करेंगे, बेटी है मछली तो नहीं है कि सड़ कर बिगड़ जाएगी
मह नौ मी शवद माह-ए-तमाम आहिस^ता आहिस^ता
(फ़ारसी कहावत उर्दू में मुस्तामल) नया चांद आहिस्ता आहिस्ता पूरा होजाता है, हर नाक़िस तरक़्क़ी करते करते कामिल हो जाता है, किसी को कमाल रफ़्ता रफ़्ता हासिल होता है
महंगा रोए एक बार, सस्ता रोए बार बार
क़ीमती चीज़ में कोई ऐब नहीं होता इस लिए वो देर से ख़राब होती है, सस्ती चीज़ नाक़िस होने के सबब बार बार ख़राब होती रहती है , रुक : सस्ता रोय बार-बार, महंगा रोय एक बार
मैं मैं न जानों
काम बिगड़े या बने मुझ पर दोषी नहीं, मैं ज़िम्मेदारी से मुक्त हो गया, मैं क्या जनूं?
मज्ज़ूब होना
वली होना, असर वाला होना । उसे तो मजज़ूब होना चाहिए
मख़मल में टाट का पैवंद
किसी आला चीज़ के साथ अदना का जोड़ हो या कोई बेजोड़, नामौज़ूं चीज़ हो तो इस के मुताल्लिक़ कहते हैं
मलक-उल-मौत ने घर देख लिया
मुसीबत को यहां तक पहुंचने का रास्ता मालूम होगया, आफ़त मानूस हो गई (जब ये कहना मक़सूद हो कि इस दफ़ा की मुसीबत या आफ़त का ग़म नहीं, फ़िक्र इस बात की है कि जब एक दफ़ा ऐसी मुसीबत या परेशानी आई तो दुबारा ना आजाए, तो ये मक़ूला कहते हैं)
मन 'अरफ़ा नफ़्सहु फ़क़द 'अरफ़ा रब्बहु
(अरबी फ़िक़रा (हदीस) उर्दू में बतौर कहावत मुस्तामल) जो अपने नफ़स की हैसियत को पहचान ले वो अल्लाह ताला के मरतबे को पहचान सकता है, इरफान-ए-बारी ताला के लिए अव्वल इरफान-ए-ज़ात ज़रूरी है
मन भाए मुंडिया हिलाए
दिल तो चाहता है मगर ऊपरी दिल से इनकार है, ज़ाहिरन नफ़रत बातिनन रग़बत , रुक : मन चाहे मंडया हिलाए, जो ज़्यादा मुस्तामल है
मन भाता खाइए, जग भाता पहनये
खाना वो खाईए जो दिल को मर्ग़ूब हो और लिबास वो पहनना चाहिए जो दूसरों को पसंद हो , रुक : खाए मन भाता, पहने जग भाता
मन भावे मुंडिया हिलावे
दिल तो चाहता है मगर ऊपरी दिल से इनकार है, ज़ाहिरन नफ़रत बातिनन रग़बत , रुक : मन चाहे मंडया हिलाए, जो ज़्यादा मुस्तामल है
मन चंचल करम दलिद्री
दिल में धन-संपन्नता परंतु भाग्यवान नहीं, दिल अमीर है मगर भाग्य बुरी है अर्थात निर्धनता है
मन गुफ़्तम व मुहावरा शुद
(फ़ारसी कहावत उर्दू में मुस्तामल) मैंने कहा और मुहावरा बिन गया, ज़बान दानी की तारीफ़ में मुस्तामल, जिस शख़्स का क़ौल हर शख़्स शुद मान ले
मन 'इल्म और दस मन 'अक़्ल
इलम से मुस्तफ़ीद होने के लिए तजुर्बे के ज़रूरत है, (फ़ारसी) 'बिक मन इलम रा दह मन अक़ल बायद' का तर्जुमा)
मन ख़ूब मी-शनासम पीरान-ए-पारसा रा
(फ़ारसी कहावत उर्दू में मुस्तामल) ज़ाहिर में कैसे नेक बिन रहे हो मगर में ख़ूब पहचानता हूँ कि तुम्हारा किरदार किया है, किसी के कार-ए-नामुनासिब पर तान के मौक़ा पर मुस्तामल
मन मानी अंजानी
दिल में जानता है, दिखाने को अपनी अज्ञानता दर्शाता है, ऊपर से अंजान बनता है
मन साँचा तो सब साँचा
नीयत सही हो तो नतीजा अच्छा निकलता है , सच्चाई अजब चीज़ है, सच्च बोल कर ऐसा महसूस होता है जैसे सारी दुनिया ख़ुश है, सिदक़ दिल अजब शैय है
मन तशब्बहा बिक़ौमिन
अरबी फ़िक़रा (हदीस) बतौर कहावत उर्दू में मुस्तामल, जो अपने अक़्वाल और अफ़आल में किसी क़ौम का मुशाबेह बनेगा वो उन्ही में शुमार होगा
मन ज़ाक़ा ज़ाक़
(अरबी फ़िक़रा उर्दू में बतौर कहावत मुस्तामल) जिस पर गुज़रे वही जानता है
मन-दानम-ओ-कार-ए-मन
(फ़ारसी फ़िक़रा उर्दू में बतौर कहावत मुस्तामल) में अपने फ़र्ज़ का ख़ुद ज़िम्मेदार हूँ, चू कुछ करना चाहिए वो में ख़ुद कर लूंगा
मन-दीगरम-तू-दीगरी
(फ़ारसी कहावत उर्दू में मुस्तामल) में और हूँ तो और है, मुझ में तुझ में फ़र्क़ है
मन-तू-शुदम-तू-मन-शुदी
(उर्दू में प्रयुक्त फ़ारसी कहावत) दोनों दो शरीर एक जान हो गए, दो शरीर एक जान होना एक होने के अवसर पर कहा जाता है
मर जाएँ तो मक्खी और निकल जाएँ तो शेर
अगर कोई क़ैदी जेल में मर जाये तो एक मक्खी के मर जाने से ज़्यादा एहमीयत नहीं दी जाएगी लेकिन अगर कोई क़ैदी भाग निकलने में कामयाब हुआ तो उसे एक शेर के कटहरे से निकल जाने के बराबर अहम वाक़िया समझा जाएगा
मर्द का दिखाया न खाइए, मर्द का लाया खाइए
मुम्किन है कि मर्द अपनी शान दिखलाने को कुछ बढ़ कर बताए इस का एतबार ना करें , औरतों के लिए नसीहत है कि मर्द के सामने खाना ना चाहिए जो कुछ वो ले आए वो खाना चाहिए
मर्द मानुस घर ही भले
महिलाओं की संतुष्टि एक पुरुष के घर में रहने में है, मर्दों को ज़्यादा वक़्त घर ही में रहना चाहिए
मर्द सब को मर्द करता है
एक बहादुर हो तो इस की देखा देखी दूसरे भी बहादुर बिन जाते हैं, एक अहल हो तो इस की अहलीयत का दूसरे साथीयों पर भी असर पड़ता है
मरे चोर पराए धन पर
पराए माल की ख़ातिर जान देना हमाक़त है, बेगाना माल मारना आसान नहीं, चोर पराए माल पर अपनी जान खो देता है
मरे माँ , जीवे मासी
अगर माँ मर जाये और ख़ाला जीती रहे तो बच्चे पुल जाते हैं क्योंकि उस की मुहब्बत भी माँ के बराबर होती है
मरे न जिए बकर बकर करे
रुक : मरे ना पीछा छोड़े, जो आदमी हरवक़त तंग करे उसे भी कहते हैं, जब तक ज़िंदा है तंग करेगा
मरे न जिए हकर हकर करे
रुक : मरे ना पीछा छोड़े, जो आदमी हरवक़त तंग करे इस के मुताल्लिक़ कहते हैं, जब तक ज़िंदा है तंग करेगा
मरे पे बेद
वक़्त गुज़र जाने पर कोशिश करने के मौके़ पर कहते हैं
मरने जाएँ , मलारें गाएँ
ऐसे बेफ़िकर आदमी हैं कि मरने को भी खेल समझ कर गीत गाते हैं, बेपर्वा और आज़ाद तबा नीज़ शेखी ख़ोरे की निसबत बोलते हैं
मरने पे डोम राजा
हिंदुओं में जब कोई मर जाता है तो मृत्यु शोक के समय पहले शब्द डोमनी बोलती है, मौत पर कमीने लोगों का फ़ायदा होता है
मरता क्या न करता
उस व्यक्ति के लिए बोलते हैं जो अपने जीवन से निराश हो कर जो चाहे करे
मरते को मारें शाह मदार
हमेशा ग़रीब ही की शामत आती है, जिस वक़्त ग़रीब आदमी पर कोई मुसीबत पड़ती है इस मौके़ पर बोलते हैं
मर्ज़ी मौला अज़ हमा औला
हर मुआमले में ख़ुदा की रज़ा पर राज़ी रहना चाहिए, मालिक की रज़ा सब से बेहतर है (किसी मुआमले में इंसान की बेबसी के मौक़ा पर मुस्तामल)
मश'अल्ची अंधा होता है
उस व्यक्ति के प्रति कहते हैं जो दूसरों को रास्ता दिखाए और स्वयं रास्ते से भटका हुआ हो
मत कर सास बुराई तेरे भी आगे जाई
बहू सास से कहती है कि तू मेरे साथ बुराई करती है हालाँकि तेरी भी बेटी है और जैसा तू मेरे साथ करती है वैसा कोई तेरी बेटी के साथ करेगा
मौसी का घर नहीं है
ख़ाला जी का घर नहीं है, आसान काम नहीं है, खेल नहीं है, किसी की सहजता और लापरवाही देखकर कहते हैं
मौत अंधी होती है
मृत्यु प्रत्येक को अवश्य आनी है, मौत हर एक को ज़रूर आनी है, जो पैदा हुआ उसे मरना भी है
मौत और गाहक का कोई ए'तिबार नहीं
मरने के लिए हर वक़्त तैयार रहना चाहिए मालूम नहीं किस वक़्त मौत आ जाए यही हाल गाहक का है इस लिए दुकानदार को भी हर वक़्त दुकान पर मौजूद रहना चाहिए
मौत-बर-हक़ है
मौत सच्च है, मौत का वक़्त मुक़र्रर है, मौत को कोई टाल नहीं सकता, मौत लाज़िमन आएगी इस से बचा नहीं जा सकता
मौत भली कि जान कंदनी
नज़ा की तकलीफ़ से मौत बेहतर है, रोज़ रोज़ की तकलीफ़ और उलझन से तो मर जाना ही बेहतर है
मौत हक़ है
मौत सच है, मौत अटल सत्य है, मौत अवश्य आएगी उससे बचा नहीं जा सकता
मौत नहीं ज़हमत है
अधिकार नहीं मारा जाता किंतु देर है, हक़ नहीं मारा जाता देर अलबत्ता है
मेरे दोनों मीठे
जब किसी को दोहरी नेअमत मिले या दोनों चीज़ें अज़ीज़ हूँ तो कहते हैं
मीरान गोर बराबर
जिस क़दर मीराँ की क़ब्र खोदी गई उतनी ही मिट्टी ऊपर पड़ गई, मीराँ की क़ब्र उतनी ही लंबी है जितने ख़ुद मीराँ: मुराद: किसी चीज़ का अदम और वजूद बराबर होना, आमदनी और ख़र्च का बराबर होना
मिलने से कोई मिलता है
आपस में मिलने से एकता हो जाती है, जो कोई किसी से मिलता है तो दूसरा भी उससे मिलता है
मियाँ बिवी दो जने ,किस लिये जौ चने
इस मौके़ पर कहा करते हैं जब किसी के लड़के लड़की ना हो और फिर वो ख़िस्त करे यानी जब सिर्फ़ मियां बीवी ही खाने वाले हैं और ख़र्च ज़्यादा नहीं है तो फिर ख़िस्त करना और जमा करके मरना बेकार है
मिज़ाज-ए-'आली, न तो शक न निहाली
जब कोई शख़्स मुफ़लिसी-ओ-तही दस्ती में नाज़ुक मिज़ाजी दिखाता है तो इस की निसबत तंज़न बोलते हैं मिज़ाज तो अमीराना रखते हैं मगर बिछा ने के लिए तोशक या नहा लुच्चा तक मयस्सर नहीं, ग़रीबी में अमीराना मिज़ाज रखने वाले पर तंज़न बोला जाता है
मोहे और न तुझे ठोर
तेरे बिन मुझे और मेरे बिन तुझे कल नहीं, ना तो मुझ ही को दूसरा मिलता है और ना तुझ को ही दूसरा ठिकाना है
मुए बैल की बड़ी बड़ी आँखें
मरे हुए संबंधी की हद से अधिक प्रशंसा करने या किसी चीज़ या घटना के बीत जाने के पश्चात उस की प्रशंसा करने के अवसर पर प्रयुक्त
मुँह छोटा और बात बड़ी
हौसले और हैसियत, रुतबे या दस्तरस वग़ैरा से बढ़ कर दावा, शेखी या कोई और बात , अपनी आजिज़ी-ओ-इनकिसारी ज़ाहिर करने के मौक़ा पर मुस्तामल
मुँह छोटा बात बड़ी
औक़ात से बढ़ कर बात करना, जब कोई कमीना आदमी घमंड और ग़ुरूर वग़ैरा की बात करता है तो कहते हैं
मुँह में रोटी सर पर जूती
निर्लज्जता के साथ जीवन यापन होता है, बड़ी बेशर्मी के साथ रोटी मिलती है, अपमान और बदनामी से गुज़र होना
मुँह में ज़बान हलाल है
मुँह में जीभ सच बोलने के लिए है, अगर (झूठ की तरह) हराम होती तो मुँह में नहीं रहती, सच कहो, न्याय से बात कहो
मुँह न तोह नाम चाँद ख़ाँ
جس صفت میں مشہور ہے اس کے خلاف صف سے متصف ہے، (کسی میں) شہرت کے مطابق صفت نہیں پائی جاتی بلکہ اس سے متضاد صفت پائی جاتی ہے
मुँह से निकली पराई हुई
जो बात ज़बान से व्यक्त हो जाए वह राज़ नहीं रहती, राज़ मुँह से निकलते ही प्रसिद्ध हो जाता है
मुँह सूई, पेट कूई
छोटा मुँह और बड़ा पेट, शरी छोटा हो परंतु ख़ुराक बहुत हो तो कहते हैं, आमदनी कम और ख़र्च ज़्यादा
मुफ़्लिसी में आटा गीला
ग़रीबी में अधिक ख़र्च होना, निर्धनता की स्थिति में ऐसे ख़र्चे पेश आना जिससे छुटकारा कठिन हो
मुफ़्त रा, चा गुफ़्त
(उर्दू में मुस्तामल फ़ारसी कहावत) जो चीज़ बे मेहनत या बे क़ीमत मिले इस के लेने में क्या उज़्र हो सकता है, जो चीज़ मुफ़्त मिले इस में क्या कलाम
मुफ़्त-करम-दाश्तन
(फ़ारसी कहावत उर्दू में मुस्तामल) कोई काम अपनी ग़रज़ से करने और दूसरे पर इस की ग़रज़ ज़ाहिर कर के एहसान जताने के मौक़ा पर मुस्तामल यानी ख़्वाहमख़्वाह एहसान जताना
मुग़ल बे-मुग़ल तेरे सर पर कोल्हो
बेतुकी बात कहने वाले के जवाब में प्रयुक्त, उदाहरणस्वरूपः किसी मुसलमान ने एक हिंदू जाट से जो खाट लिए जाता था कहा जाट रे जाट तेरे सर पर खाट, वह मुसलमान एक दिन कोल्हू सर पर रखे लिए जाता था, जाट ने कहा ''मुग़ल रे मुग़ल तेरे सर पर कोल्हू'' मुग़ल ने कहा ''यार तुक
मुझे बुढ़िया न कहो कोई , मैं ने जवानों की भी 'अक़्ल खोई
चालाक ज़ईफ़ अपने मुताल्लिक़ कहता है कि वो जवानों को उंगलीयों पहुंचा सकता है , ज़ईफ़ चालाक औरत का क़ौल है कि में बढ़िया हूँ तो क्या हवा में नौजवानों को भी फ़रेफ़्ता करलेती हूँ , बुज़ुर्गों की बनिसबत जवान नापुख़्ता कार होते हैं, जवान बुज़ुर्गों से इलम-ओ-शऊर हासिल करते हैं
मुझे दे सूप तू हाथों फूँक
स्वार्थी व्यक्ति के संबंध में कहते हैं कि उसे अपने काम से काम होता है दूसरे की पीड़ा एवं तकलीफ़ की परवाह नहीं होती
मुझी दे सोप तो हाथों फूँक
ख़ुदग़रज़ आदमी के मुताल्लिक़ कहते हैं कि उसे अपने काम से काम होता है दूसरे की तकलीफ़ की पर्वा नहीं होती
मुखड़ा तलवों को न पहुँचे
एक शख़्स इस क़दर ख़ूबसूरत है कि दूसरे शख़्स के चेहरे का रंग इस के तलवों के रंग का मुक़ाबला नहीं कर सकता (इंसान की रंगत की तारीफ़ में कहते हैं), मुक़ाबलतन एक इंसान का दूसरे इंसान से कमतर होना , मुक़ाबले में बहुत हक़ीर है
मुल्ला की मारी हलाल
प्रभावशाली और महान लोगों के बुरे कर्मों को भी अच्छा माना जाता है, बड़े आदमियों का बुरा काम भी दुरुस्त और वैध समझा जाता है
मुंडी गाय सदा कलोर
जिस गाय के सींग ना हूँ वो बछिया मालूम होती है नीज़ सन से उतरी हुई वो औरत जो जवान बने
मुर्ग़ की एक टाँग
अपनी बात की हठ, अपने ग़लत या झूटे कथन की हठ (उस वक़्त कहते हैं जब कोई अपनी बेजा बात पर अड़ा हुआ हो)
मुर्ग़ी को तकले का घाओ बहुत है
۔मिसल ग़रीब को थोड़ा नुक़्सान भी बहुत है।कमज़ोर को थोड़ा सदमा भी बहुत है।(मुहसिनात)बढ़िया हरियाली और कोठरी की दीवार में आकर बच गई मगर वही मिसल है मुर्ग़ी को तकले ही का घाओ बहुत होताहै दोतीन दोहतड़ जो इस पर जमे सिसकियां लियेने लगी
मुर्ग़ी की एक टाँग
रुक : मुर्ग़ी की एक टांग, वहां बोलते हैं जहां कोई अपनी ग़लत बात पर उड़ा रहे
मुसलमानी और आना कानी
अपने लिंग से दूरी बनाने वाले के बारे में बोलते हैं, मुसलमान होने के बावजूद दया से दूरी
मूए का कोई नहीं, जीते का सब कोई
जीवित की सभी चापलूसी करते हैं, मृत का कोई नाम नहीं लेता, धनी के सभी मित्र होते हैं, निर्धन की मिट्टी अपवित्र है, शक्तिशाली के सभी साथी हैं, कमज़ोर का कोई साथ नहीं देता
मूए की क़ब्र और जीते का घर
मुर्दे को क़ब्र में आराम और ज़िंदा को घर में, हर व्यक्ति अपनी जगह पर ही ठीक ढंग से रहता है, हर व्यक्ति अपनी जगह पर ख़ुश रहता है, हर चीज़ अपनी उचित जगह पर अच्छी लगती है
मूए पर तीन दिन भारी
कहा जाता है कि मुर्दे की आत्मा पर तीन दिन तकलीफ़ रहती है, मुर्दे से तीन दिन तक उसके कर्मों के बारे में पूछताछ की जाती है
मूई बछिया बामन को दान
बेकार और ख़राब चीज़ जो अपने काम की न हो उसे दूसरे को देदी या भगवान के नाम पर दान दे दिया
मूई माई, टूटी सगाई
जिनकी मित्रता से रिश्ते और संबंध हों, जब वो मर जाएँ तो वह बात नहीं रहती; मामला ख़त्म होने के बाद कुछ मतलब नहीं होता
मूछ मरोड़ा रोटी तोड़ा
उस व्यक्ति के संबंध में कहते हैं जो मुफ़्त की रोटियाँ खाए काम कुछ न करे और मूछों पर ताव देता फिरे