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सुकून-ए-क़ल्ब

दिल का इतमीनान, दिल की शांति, आराम, सहायता, चैन और सुख

ख़िल्क़िय्या

प्राकृतिक, फ़ित्री

खिस्यानी बिल्ली खम्बा नोचे

जिसे क्रोध आ रहा हो वह अपनी खीझ या क्रोध दूसरों पर उतारता है, लाचारी में आदमी दूसरों पर क्रोध करता है, लज्जित व्यक्ति दूसरों पर अपनी लज्जा उतारता है, निर्बल की खीझ

सुरूर

मन-मस्तिष्क की शांति या सुकून प्रदान करने वाली अवस्था, ख़ुशी, आनंद, प्रसन्नता, मस्ती, तन्मयता

बे-हिजाबी

बेे-पर्दा होना, बेपर्दगी, घूँघट उठा देना, खुलेबंदों फिरना (स्त्री का)

शरीक-ए-हयात

ज़िंदगी का दोस्त या साथी, अर्थात: जीवनसंगिनी, पत्नी, भार्या, पति

मशवरत

आपस में सोच विचार एवं सलाह या राय का आदान-प्रदान करना, सलाह, मशवरा, परस्पर सुझाव

सितमगर

(प्रायः कविता में) प्रेमिका, माशूक़, महबूब

कोशिश

कोई काम करने के लिए विशेष रूप से किया जानेवाला प्रयत्न, मेहनत, दौड़ धूप, प्रयत्न, प्रयास, चेष्टा, उद्योग, श्रम, उद्यम, उपाय, परिश्रम

बे-नियाज़

जिसे किसी से कुछ लेने की इच्छा न हो निःस्पृह, स्वच्छंद, आज़ाद, बेपरवाह

दीद के क़ाबिल

देखने के लायक़, देखने योग्य

क़ाबिल-ए-दीद

देखने लायक़, अच्छा दिखने वाला

आठ बार नौ त्योहार

सुख-सुविधा और आराम का शौक़ या लगन ऐसा बढ़ा हुआ है कि युग और समय उसको अल्प व्यय नहीं करने देता

चमनिस्तान

ऐसा बाग़ जहाँ फूल ही फूल हों, ऐसी जगह जहाँ दूर तक फूल ही फूल और हरा भरा नज़र आए, वाटिका, चमन, बाग़

'औरत

जाया, भार्या, पत्नी, जोरू

ताग़ूत

शैतान, अत्यन्त निर्दय और अत्याचारी व्यक्ति

मन-भावन

मन को भाने या अच्छा लगने वाला

दादरा

संगीत में एक प्रकार का चलता गाना (पक्के या शास्त्रीय गानों से भिन्न), एक प्रकार का गान, एक ताल

मज़दूर

शारीरिक श्रम के द्वारा जीविका कमाने वाला कोई व्यक्ति, जैसे: इमारत बनाने, कल-कारख़ानों में काम करने वाला, श्रमिक, कर्मकार, भृतक, मजूर

ख़ैर-अंदेश

भलाई की बात सोचने वाला, वह शख़्स जो किसी की भलाई चाहे, शुभचिंतक

मुहावरे

यह भारतीय मुहावरों का एक शब्दकोश है, जो रेख्ता फ़ाउंडेशन की एक पहल है। इसमें सदियों से प्रचलित पारंपरिक कहावतों और मुहावरों का एक मूल्यवान संग्रह शामिल है, जो भारतीय उपमहाद्वीप की संस्कृति, समाज और दैनिक जीवन को प्रतिबिंबित करता है। यह शब्दकोश आलोचकों, शोधकर्ताओं, विद्यार्थियों तथा भाषा और साहित्य के प्रेमियों के लिए एक अत्यंत उपयोगी और विश्वसनीय संदर्भ स्रोत के रूप में कार्य करता है।

प्रमुख मुहावरे

मुहावरों की सूची

संबंधित परिणाम

मंढते बने तो ख़ूब बजे

काम बिन जाता है तो डींग की सूझती है

मँगाई मिस्सी, ले आया मिट्टी

हुक्म या फ़र्माइश के ख़िलाफ़ काम करने वाले के बारे में कहते हैं , निहायत बेवक़ूफ़ है

मँगबू भलो न बाप से जो ईशर राखे टेक

अगर ख़ुदा ताला पनाह (तौफ़ीक़) दे तो बाप से भी कुछ माँगना ना चाहिए

मंगनी की चादर टाँके पचास की आदर

ओछा, तुच्छ ज़रा सी बात पर इतराता फिरता है

मंगनी न टंगनी, गुड़िया का ब्याह

शादी या मंगनी का महिज़ नाम ही है वर्ना एक खेल सा है, वहां कहते हैं जहां शादी का निरा आराम आराम हव

मंगनी से मीठी नहीं और चौथी से कड़वी नहीं

मंगनी बहुत अच्छी चीज़ है, मंगनी में ज़्यादा मज़ा आता है और चौथी की रस्म में अक्सर झगड़ा हो जाता है

मा ऐली बाप तेली, बेटा शाख़-ए-ज़ा'फ़रान

मजहूल अलनस्सब या कमीने शेखी बाज़ के हक़ में बोलते हैं और जब कोई अदना फ़ख़्रे ख़ानदान हो जाये तो इस की निसबत भी कहा जाता है

मा बेटियों में छिनाला नहीं छुपता

पास रहने वालों से ऐब नहीं छप सकता

मा बेटों में लड़ाई हुई लोगों ने जाना बैर पड़ा

अपनों की लड़ाई को लड़ाई नहीं समझना चाहिए, अपनों की लड़ाई या ख़फ़गी देरपा नहीं होती

मा भटियारी पूत फ़त्ह ख़ाँ

रुक: माँ भटियारी बाप फ़ितख़ ख़ां अलख

मा चील बाप कव्वा

कमअस्ल, दोग़ला

मा फ़क़ीरनी पूत फ़त्ह-ए-ख़ाँ

कमक़दर, मजहूल अलनस्सब या कमअस्ल मग़रूर आदमी की निसबत कहा जाता है

मा के पेट से ले कर कोई नहीं आता

सीखा सिखाया कोई पैदा नहीं होता (कम शौक़ की तवज्जा, दिलचस्पी और हौसलाअफ़्ज़ाई के लिए कहा जाता है)

मा के पेट से ले कर निकलना

सीखा सिखाया पैदा होना, साथ लेकर पैदा होना, सीखे बगै़र कुछ हासिल करना जो मुहाल अमर है

मा मारे तो भी मा ही पुकारे

अपनों की फ़र्याद अपनों ही से की जाती है, अपनों की सख़्ती भी बुरी नहीं लगती, जिस तरह बच्चा मा से कैसा ही पट्टे मगर मा, मा कहता जाएगा

मा मरे माैसी जिये

यानी मा मर जाएगी तो ख़ाला पाल लेगी यानी मा और ख़ाला में कुछ फ़र्क़ नहीं है

मा न मा का जाया सभी लोग पराया

अजनबी मुक़ाम की निसबत बोलते हैं

मा पसन्हारी भले, बाप हफ़्त हज़ारी बुरा

माँ की मुहब्बत बाप से ज़्यादा होने की निसबत बोलते हैं, मा त्व पसनहारी भी परवरिश कर लिया करती है बाप ख़बर भी नहीं लेता

मा टेनी बाप कलंग, बच्चे निकले रंग-ब-रंग

नालायक़ कुंबा या ख़ानदान और बदअतवार औलाद की निसबत कहा जाता है

माई बाप के लातें मारे मेहरी देख जुड़ाय, चारों धाम जो फिरे आवे तबहूँ पाप न जाय

जो अपनी बीवी की ख़ातिर माता-पिता को मारे यदि वो सारी दुनिया के तीर्थ फिर आए फिर भी उसका पाप नहीं धुलेंगे

माइयाँ तो बहुत मिली हैं पर बाबू कोई नहीं मिला

सब कमज़ोर ही मिले हैं, ज़बरदस्त से वास्ता नहीं पड़ा , अब तक तुम्हारा पाला कमज़ोरों से पड़ा है किसी ताक़तवर को नहीं देखा यानी शरीरों के सज़ा देने वाले भी मौजूद हैं

माइयाँ तो बहुत मिली हैं पर बापू कोई नहीं मिला

सब कमज़ोर ही मिले हैं, ज़बरदस्त से वास्ता नहीं पड़ा , अब तक तुम्हारा पाला कमज़ोरों से पड़ा है किसी ताक़तवर को नहीं देखा यानी शरीरों के सज़ा देने वाले भी मौजूद हैं

माँ बाप जनम के साथी हैं, कर्म के नहीं

माँ बाप ज़िंदगी में साथ देते हैं आख़िरत में कोई काम नहीं आता

माँ बाप जीते, हराम का नहीं कहलाता

जिसके पास सबूत है वह इल्ज़ाम सर नहीं लेता

माँ बहन पुनना

किसी की माँ और बहन को बुरा भला कहना, किसी की माँ बहन में ऐब निकालना, गालियां देना

माँ बेटी दो ज़ात , फूपी भतीजी एक ज़ात

लड़की में माँ के बजाय ज़्यादा तर फोपी की आदतें होती हैं

माँ बेटी गाने वाली , धी डोमनी बाप पूत बराती

बे सर्व सामानी की कैफ़ीयत, ग़रीबों की शादी के मुताल्लिक़ कहते हैं

माँ बेटों में लड़ाई हुई, लोगों ने जाना बैर पड़ा

अपनों की लड़ाई को लड़ाई नहीं समझना चाहिए, अपनों की लड़ाई या अप्रसन्नता देर तक नहीं रहती

माँ भटियारी पूत फ़तह ख़ाँ

पल्ले कुछ न होते हुए भी शेख़ी बघारना

माँ चाहे बेटी को, बेटी चाहे मूए ढींग को

माँ को जितनी मुहब्बत बेटी से होती है उतनी मुहब्बत बेटी को माँ से नहीं होती, शादी के बाद बेटी अपने ख़ावंद को ज़्यादा चाहती है

माँ छोड़ मौसी से ठठ्ठा

जब कोई छोटा बदतमीज़ी करे तो महिलाएँ कहती हैं

माँ डायन बाप ओझा

दोनों एक जैसे अर्थात ऐसे माँ-बाप का लड़का भयंकर तो होगा ही यह भाव छिपा है

माँ धोबन पूत बज़ाज़

छोटे दर्जे का माँ-बाप की संतान बड़ेपन अथवा सज्जनता का दावा करे तो कहते हैं

माँ एली, बाप तेली, बेटा शाख़-ए-ज़ा'फ़रान

बेटा माँ-बाप से बढ़ कर निकला, जब कोई साधारण व्यक्ति असाधारण होने का दा'वा करे तो कहते हैं

माँ फ़क़ीरनी पूत फ़तह ख़ाँ

मजहूल अलनसब मग़रूर शख़्स, अदना वालदैन की औलाद बड़ाई का दावा करे तो कहते हैं

माँ का मान भला

माँ संतान का गर्व करे तो बजा है, संतान को माँ का आदर करना चाहिए

माँ का पेट कुम्हार का आवा, कोई काला कोई गोरा

एक ही माँ के लड़के अलग-अलग रंग-रूप के होते हैं उसी पर कहते हैं

माँ का पूत सास का जँवाई

जो शख़्स वालदैन का मुतीअ और फ़रमांबरदार होगा वो सास का भी अदब करेगा

माँ काली और औलाद पर गाली

माँ काली हो तो औलाद भी बिलावजह बुरी तसव्वुर की जाती है

माँ कहे मेरा हुआ बडेरा , 'उम्र कहे में आई नबेड़ा

जब बच्चा जवान होता है माँ ख़ुश होती है हालाँकि उस की उम्र कम होजाती है जो ख़ुशी की बात नहीं है

माँ के घर बेटी गूदड़ लपेटी

वालदैन बेटी से ज़्यादा बेटों को चाहते हैं, बेटी की क़दर वालदैन से ज़्यादा ससुराल में होती है

माँ के पेट से सीख कर कोई नहीं आता

सीखा सिखाया कोई नहीं पैदा होता, काम सीखने ही से आता है

माँ खेत में, पूत जनेत में

कुसुम को कहते हैं जिसके रंग से पगड़ी रंगी जाती है और विवाह में पहनी जाती है

माँ की सोत न बाप की यारी, किसी नाते की तू मन्हारी

(ओ) कोई ख़्वाहमख़्वाह का रिश्ता जताए तो कहती हैं कि तरह हम से कोई ताल्लुक़ नहीं है

माँ को न बाप को जो बनेगी सो आप को

हर कोई अपने कार्यों का उत्तरदायी है, कोई किसी दूसरे के शब्दों के लिए उत्तरदायी नहीं है

माँ मारे और माँ ही पुकारे

लड़के का माँ के प्रति अपनापन है कि माँ के मारने पर भी वह माँ को बुलाता है

माँ मरे बग़ैर कफ़न, बेटे का नाम बुक़्ची

गपी्य की निसबत कहते हैं कि पल्ले कुछ नहीं मगर शेखी बहुत

माँ मरे मौसी जिये

माँ और मौसी की मोहब्बत में कोई अंतर नहीं, माँ मर जाए तो मौसी बच्चों की देखभाल करती है

माँ न माँ का जाया, सभी लोग पराया

अजनबी जगह पर बोलते हैं जहाँ कोई भी अपना जानने वाला न हो

माँ पनहारी, बाप कंजर, बेटा मिर्ज़ा संजर

यदि अज्ञातकुल व्यक्ति प्रतिष्ठित अथवा सम्मानित होने का दा'वा करे तो कहते हैं

माँ पिसनहारी बाप कंजर, बेटा मिर्ज़ा संजर

जब कोई छोटा आदमी बहुत दिखावा करता है तब व्यंग्य में कहते हैं

माँ पिसनहारी भली, बाप हफ़्त हज़ारी बुरा

माँ का प्रेम बाप से अधिक होता है

माँ पिसनहारी पूत छैला, चूतड़ पर बाँधे बूर का थैला

माँ पिसनहारी है इसलिये लड़का भूसी के सिवा और किस चीज़ से अपना शौक़ पूरा करेगा

माँ रोवे तलवार के घाव से, बाप रोवे तीर के घाव से

अयोग्य एवं बदचलन संतान अपने माँ-बाप को सताती है

माँ से ले कर कौन आया है

सब सिखाए ही सीखते हैं

माँ से ज़्यादा चाहे सो डाइन

रुक : माँ से ज़्यादा चाहे फा फा कटनी कहिलाय

माँ टेनी बाप कुलंग बच्चे निकले रंग बिरंग

निकम्मे माँ-बाप के निकम्मे लड़के

माँ-बाप को बुरा कहवाना

बड़ों को बुरा भला कहलवाना

माँग जाँच के गए झाँझा , माँग लें तो लगे लाजा

अगर दे दें तो ग़ुस्सा आए, अगर वापिस ले ले तो श्रम आए, इस के मुताल्लिक़ कहते हैं जो कोई चीज़ मजबूरन दे

माँगा पूत पड़ोसी बराबर

गोद ली हुई औलाद सगी औलाद जैसी नहीं हो सकती

माँगे हड़, दे बहेड़ा

सवाल दूसरा जवाब दूसरा, एक कुछ कहे दूसरा कुछ और

माँगे हुड़, वे बुहेड़ा

सवाल अन्य जवाब अन्य, एक कुछ कहे दूसरा कुछ

माँगे का तांगा बुढ़िया की बरात

पराई चीज़ पर शेखी मारने वाले के लिए बोलते हैं

माँगे की मंगनी गुड़िया का सिंगार

उस वक़्त कहते हैं, जब कोई पराई चीज़ माँग कर इस्तेमाल करे और उस पर इतराए

माँगे की मंगती गुड़िया का सिंगार

इस वक़्त कहते हैं जब कोई पराई चीज़ मांग कर इस्तिमाल करे और इस पर इतराये

माँगे में ताँगा

ख़ुद तो मांगें और दूसरों को आर्यन दें

माँगे ताँगे टुकरे पर बाज़ार में डकार

ग़ैरों की इमदाद और सहारे पर शेखी ज़ाहिर करना, दूसरों की इमदाद पर अकड़ना

माँगी धाड़ है

लोग मुतफ़र्रिक़ इधर उधर के जमा हो गए हैं काम देने वाले नहीं, ग़ैर मुनज़्ज़म जमईयत है, सलीक़े से काम नहीं करसकती

माँस बिना सब साग

माँस न हो तो बाक़ी भोजन घास हैं

माँस सब खाते हैं हाड गले में कोई नहीं बाँधता

लायक़ को सब पसंद करते हैं, नालायक़ को कोई भी पसंद नहीं करता

माधौ आया और ख़ाकी समाया

ख़ामोशी से नेक काम कर जाना, नेकी करके ग़ायब होजाना , शौहरत-ओ-सुलह से बेनयाज़ होकर नेक काम करना

माधौ का देन ना ऊधौ का लेन

न किसी का लेना न देना, कोई चिंता नहीं

माघ का जाड़ा जेठ की धूप, बड़े कष्ट से उपजे ऊख

ऊख की खेती में बहुत मेहनत करनी पड़ती है, माघ का जाड़ा सहना पड़ता है और जेठ की गर्मी भी तब ऊख उपजती है

माघ नंगी बैसाख भूकी

बहुत ग़रीब, सदा मुफ़लिस, सर्दी में पहनने को कपड़ा नहीं मिलता और गर्मी में पेट भर कर खाने को नहीं मिलता

माघ पूस की बादरी और कुवार का घाम, इन सब को झेल कर करे पराया काम

नौकरी करना आसान नहीं है इस में माघ और पूस की बारिश कुवार की गर्मी झेलनी पड़ती है तब मालिक का काम होता है

माघ तलातल बाढ़े, फागुन गोड़े काढ़े

माघ के महीने में ठंड की वजह से इंसान सिकुड़ कर सोते हैं, फागुन में घुटने फैला लेते हैं

माघे जाड़ न पूसे जाड़

माघ या पूस में सर्दी नहीं होती बल्कि हवा चलने से सर्दी होती है

माघे जाड़ न पूसे जाड़, बता से जाड़

माघ या पूस में सर्दी नहीं होती बल्कि हवा चलने से सर्दी होती है

माह ही माह, नहीं अगले माह

आम का फल अगर वक़्त पर ना हो तो फिर अगले बरस होगा

माह में ककोड़े

अनुचित समय और मौसम में कोई चीज़ नहीं मिलती

माल का मुँह करता है, जान का मुँह नहीं करता

कंजूस के लिए कहते हैं जो धन को प्राणों से अधिक चाहता है

माल का नुक़्सान जान की ख़ैर

उस समय कहते हैं जब माल का नुक़्सान हो कर जान बच जाए

माल के नुक़्सान में जान की ख़ैर

जब किसी की हानि हो जाए तो उसकी सांत्वना के लिए कहते हैं कि माल जा कर जान बच जाए तो अच्छा है

माल की ख़ातिर पहाड़ उठाते हैं

माल के लिए मुश्किल से मुश्किल काम का ज़िम्मा लेते हैं

माल लुटे सरकार का मिर्ज़ा खेले होली

ख़र्च किसी का मज़े कोई करे, बेईमानी से पराए के धन पर मज़े करना, दूसरों के माल को नष्ट करके आनंद उठाना

माल लुटे सरकार का, मिर्ज़ा खेलें फाग

बेईमानी या पराए के धन पर मज़े करना, औरों के माल को नष्ट करके अपने आनंद उठाना

माल मूज़ी नसीब ग़ाज़ी

۔मिसल ।बख़ील का माल मिलने के लिए मुस्तामल है।सच्च कहा है किसी ने।

माल पर ज़कात है

आय पर ख़र्च निर्भर है, आय पर ही दान निर्भर है, हैसियत पर जूता है

माल-ए-'अरब पेश-ए-'अरब

अपना माल अपनी आँखों ही के सामने अच्छा रहता है, अपना माल अपने ही क़ब्ज़े में रहे तो अच्छा है

माल-ए-हराम बूवद बजाए हराम रफ़्त

(फ़ारसी कहावत उर्दू में मुस्तामल) जैसी नाजायज़ कमाई थी वैसी ही नाजायज़ मुद्दों में ख़र्च हुई, नाजायज़ माल जिस तरह आया था इसी तरह चला गया, हराम की कमाई यूंही उड़ जाती है

माल-ए-मुफ़्त दिल-ए-बे-रहम

उस समय पर बोलते हैं जब पराया माल अंधाधुंध ख़र्च किया जाए

माली के फूल डाली में

जो चीज़ जहाँ की हो वहीं अच्छी मालूम होती है

मालिक ज़िंदा माल मीरास

कोई ज़िंदगी में ही जायदाद से महरूम कर दिया जाये या बदमाश रूबरू ही लूट कर खा जाये तो कहते हैं, बदतमाश का किसी को ज़बरदस्ती लूट या ठग लेना

मामा बन कमाइए और बीवी बन खाइए

ख़ुद काम करो और इस का फल पाओ, नौकर भी ख़ुद आक़ा भी ख़ुद

मामूं के कान में अंटियाँ भांजा ऐंडा ऐंडा फिरता है

उस व्यक्ति के संबंध में कहते हैं जो अपने संबंधियों के धन-दौलत पर घमंड करे

मामूँ मुँह में कामों

अत्य्यधिक दरिद्र है

मान का आँकस ज्ञान है

इलम से एतिक़ाद और यक़ीन पैदा होता है

मान का पान भला

रुक : मान का पान भी बहुत होता है

मान का पान भी बहुत है

थोड़ा सा पूछ लेना भी ग़नीमत है

मान का पान भी ग़नीमत है

इज़्ज़त के साथ थोड़ा मिलना भी बहुत होता है , थोड़ा सा पूछ लेना भी ग़नीमत है

मान का पान हीरा समान

इज़्ज़त से मिली हुई थोड़ी चीज़ भी हीरे के बराबर है

मान का ज़हर और अपमान का लड्डू

इज़्ज़त का ज़हर ज़िल्लत के लड्डू से बेहतर है

मान न मान मैं दुल्हा की चची

अनावश्यक संबंध जताना, बलपूर्वक किसी का संबंधी बनना

मान न मान मैं तेरा मेहमान

बिना निमंत्रण किसी के यहाँ जाने, अकारण किसी की बात में हस्तक्षेप करने या बलपूर्वक किसी काम में सम्मिलित होने वाले के लिए बोलते हैं

मानस के से हाथ पाँव मानस की सी काया, चार महीने बरखा बीती छप्पर क्यूँ नही छाया

ये वह दोहरा है जो बुए ने बंदर से कह कर अपना घोसला बर्बाद किराया था

मानो तो देव नहीं तो भेंट कालियो

रुक : मानव तो देवता अलख

मानो तो देव नहीं तो भेत कालियो

रुक : मानव तो देवता अलख

मानो तो देवी न मानो तो पत्थर

एतिक़ाद ही से किसी की इज़्ज़त-ओ-हुर्मत की जाती है, अगर एतिक़ाद नहीं तो कुछ भी नहीं

मानो तो देवता न मानो तो पत्थर

एतिक़ाद ही से किसी की इज़्ज़त-ओ-हुर्मत की जाती है, अगर एतिक़ाद नहीं तो कुछ भी नहीं

मानो तो देवता नहीं मानो तो पत्थर

एतिक़ाद ही से किसी की इज़्ज़त-ओ-हुर्मत की जाती है, अगर एतिक़ाद नहीं तो कुछ भी नहीं

मानो तो ईशर न मानो तो पत्थर

एतिक़ाद ही से किसी की इज़्ज़त-ओ-हुर्मत की जाती है, अगर एतिक़ाद नहीं तो कुछ भी नहीं

मानो तो ठाकुर न मानो तो पत्थर

एतिक़ाद ही से किसी की इज़्ज़त-ओ-हुर्मत की जाती है, अगर एतिक़ाद नहीं तो कुछ भी नहीं

मानुस के पहचानने को मु'आमला कसौटी है

जो मुआमले में ठीक निकला वो भलामानस है

मानुस की पहचान को मु'आमला कसौटी है

जो मुआमले में ठीक निकला वो भलामानस है

मापा कन्नया और पटवारी, भेंट लिए बिन करें न यारी

खेत नापने वाला क़ानूनगो और पटवारी बिना रिश्वत लिए काम नहीं करते

मापा शोरबा और गिनी डलियाँ

खाने पीने की चीज़ों की कमी, किफ़ायत शिआरी, सोच समझ कर ख़र्च करना, ख़स्त

मा'क़ूल मी शवंद चू मा'ज़ूल मी शवंद

(फ़ारसी कहावत उर्दू में मुस्तामल) जब लोग अपने ओहदे से हटा दिए जाते हैं तो उन्हें अक़ल आजाती है या इंसान जब अपने ओहदे पर नहीं रहता इस में इंसानियत आजाती है

मार धाड़ गुसय्याँ तेरी आस

रुक : मार पीट गुसेां अलख

मार गज़ीदा अज़ रेस्माँ मी तरसद

साँप का काटा रस्सी से डरता है, दूध का जला छाछ फूँक फूँक कर पीता है

मार गुसय्याँ, तोरी आस

बहुत सताए जाने पर नौकर का मालिक से या पत्नी का पति से कहना

मार के आगे बंदर नाचे

रुक : मर से भूत भागता है

मार के आगे भूत भागे

मार के आगे सब दुष्टता और शरारत दूर हो जाती है

मार के आगे भूत भागता है

मार से भूत भागता है, मार के आगे सब शरारत और कपट दूर हो जाती है, पिटाई से ही दुष्ट ठीक हो जाते हैं

मार के आगे भूत नाचे

रुक : मार से भूत भागता है

मार के आगे सँवार , जूती से सीधा हुआ गँवार

कहा जाता है कि सख़्ती और सज़ा से सरकशों की इस्लाह हो जाती है, मार से सरकशी और बदा तिवारी दूर हो जाती है

मार खाता जाए और कहे ज़रा मारो तो सही

कायर और निर्लज्ज के लिए कहते हैं

मार पीछे बेद

लड़ाई के बाद बदला लेना कठिन, काम निकल गया, अब क्या आवश्यकता है

मार पीट गुसय्याँ तूरी आस

नौकर मालिक को या बीवी ख़ावंद को कहती ले कि मालिक तो जितना चाहे मुझे मार्ले में तो तेरे भरोसे पर हूँ, हर हाल में भरोसा करना

मार से भूत भागता है

मार के आगे सब सरकशी और शरारत दूर हो जाती है

मारा मुँह तबाक़ आगे धरा न खाए

मारे हुए आदमी का खाने को भी दिल नहीं चाहता

मारे आप लगावे ताप

आप करे दूसरे के सर थोपे

मारे मरे न काटे कटे

मुश्किल काम जो ख़त्म होने ही को ना आए, ऐसा शख़्स जिस से पीछा छुड़ाना मुश्किल हो

मारे मेहर और भागे पड़ोसन

कोई महिला पिट रही है और पड़ोसिन भागती है कि कहीं मैं भी न पिट जाऊँ

मारे न चूही, नाम फ़तेह ख़ाँ

डींग हाँकने वाले से कहते हैं

मारे न कूटे दिल ही दिल में घोंटे

दरपर्दा किसी को अज़ी्यत दे कर सीधा करना, पस-ए-पुश्त किसी को तकलीफ़ पहुंचा कर सुधारना

मारे से पदाया अच्छा

धमकी से काम निकाल लेना चाहिए

मारे से टका पैदा होता है

मेहनत से रुपया हासिल होता है

मारे सिपाही नाम सरदार का, काटे बाढ़ नाम तलवार का

कारिंदों की कार-गुज़ारी से रईस की नेक-नामी होती है

मार-मार कर सती करना

ज़बरदस्ती काम कराना

मारने वाले से जिलाने वाला बड़ा है

शत्रुओं के विरोध पर ईश्वर की रक्षा प्रबल और बड़ी होती है

मारते का हाथ पकड़ा जा सकता है कहते का मुँह नहीं पकड़ा जाता

बदज़बान की ज़बान नहीं रोकी जा सकती, किसी को कोई बात कहने से नहीं रोका जा सकता

मारते का हाथ पकड़ा जाता है कहते की ज़बान नहीं पकड़ी जाती

बदज़बान की ज़बान नहीं रोकी जा सकती, किसी को कोई बात कहने से नहीं रोका जा सकता

मारते के हाथ पकड़े जाते हैं कहते का मुँह नहीं पकड़ा जाता

मुँहफट की ज़बान नहीं रोकी जा सकती, किसी को कोई बात कहने से नहीं रोका जा सकता

मारते के पीछे भागते के अगाड़ी

बुज़दिल के लिए मुस्तामल, बुज़दिल आदमी लड़ाई में पीछे रहता है और भागने वालों में आगे होता है

मारते ख़ाँ से सब डरते हैं

ज़ालिम से सब डरते हैं

मारूँ घुटना फूटे आँख

मारा तो घुटने में सोच कर मगर फूट गई आँख आर्थात जब करना हो कुछ और हो जाए कुछ

मास बिना सब घास रसोई

बिना माँस के भोजन अच्छा प्रतीत नहीं होता है, माँस के बिना भोजन बे-स्वाद होता है

मास खाए मास बढ़े अन्न खाए ओझड़ी

गोश्त खाने से आदमी मोटा होता है और अनाज खाने से पेट बढ़ता है

मास खाए मास बढ़े, घी खाए बल होय, साग खाए ओझ बढ़े बूता कहाँ से होय

मांस खाने से मांस बढ़ता है, घी खाने से बल बढ़ता है और साग खाने से पेट बढ़ता है परंतु बल नहीं होता

मा'शूक़ की ज़ात बे-वफ़ा है

प्रेमी वफ़ादार नहीं होते, प्रेम करने वाले निष्ठावान नहीं होते

माट का माट ही बिगड़ा है

सबके सब एक जैसे ख़राब हैं, घर या समाज के लोगों के लिए कहते हैं

माट कलाट बिगड़ा है

सब की अक़्ल जाती रही या सारे ख़ानदान को दाग़ लगा, सबके सब बेवक़ूफ़ हो गए हैं

मात कर्दम मात कर्दम कस तुरा, नाक काटूँ कान काटूँ से छुरा

बैतबाज़ी में जो लड़का जीत जाता है वो अपने हरीफ़ के ज़लील करने के लिए कहता है कि मैंने तुम को शिकस्त दे दी है अब तेरी नाक और कान काटोंगा

मात कर्दम मात कर्दम मन तुरा, नाक काटूँ कान काटूँ ले छुरा

बैतबाज़ी में जो लड़का जीत जाता है वो अपने हरीफ़ के ज़लील करने के लिए कहता है कि मैंने तुम को शिकस्त दे दी है अब तेरी नाक और कान काटोंगा

मातल-मुफ़्ती माताल-फ़तवा

मुफ़्ती मर गया फ़तवा मर गया, यानी मरने वाले के साथ उसकी बात ख़त्म हो जाती है, जिसका दौर होता है उसकी बात चलती है

माथ मुँडा के फजीहत भए, जात पाँत दोनों से गए

फ़क़ीर हो कर सोचा था कि मज़े से गुज़रेगी, मगर कहीं के भी न रहे, हिंदुओं में जो व्यक्ति एक बार फ़क़ीर हो जाए फिर वह अपनी ज़ात में वापस नहीं आ सकता

माथे का मुंडाना बैल का खसना

सर मुँडाते ही ओले पड़े

माथे पर मोटरी, बसंत के गीत

सर पर तो गठरी है और बंसत के गीत गाती है

माया गंठ औरर बिद्या कंठ

रुपया अपने क़बज़े में होना चाहिए और इलम दिमाग़ में

माया हुई तो क्या हुआ हरदा हुआ कठोर, नौ नेज़े पानी चढ़ तो भी न भीगी कोर

दौलतमंद का दिल अगर पत्थर है तो किसी काम का नहीं, कंजूस के मुताल्लिक़ कहते हैं कि इस पर कोई असर नहीं होता

माया हुई तो क्या हुआ हरदा हुआ कठोर, नौ नेज़े पानी चढ़ा तो भी न भीगी कोर

दौलतमंद का दिल अगर पत्थर है तो किसी काम का नहीं, कंजूस के मुताल्लिक़ कहते हैं कि इस पर कोई असर नहीं होता

माया के लम्बे लम्बे हाथ

दौलत की रसाई बहुत दूर तक होती है, दौलत से पहुंच में इज़ाफ़ा हो जाता है

माया के तीन नाम, परसा, परसू, परसराम

इंसान की इज़्ज़त दौलत की वजह से होती है, जब ग़रीब था तो लोग प्रसा कहते थे, जब ज़रा हैसियत बनी तो प्रसव कहने लगे, जब दौलतमंद होगया तो परसराम कहलाने लगा

माया मरी न मन मरे मर मर गए सरीर, आसा तिरिश्ना न मरे कह गए दास कबीर

ना तो क़ुदरत मरती है ना दिल ना ख़ाहिश ना उम््ीद, बदन मर जाता है उम्मीदवार प्यासा रह जाता है

माया मिली न राम

न दुनिया मिली, न धर्म मिला, न इधर के रहे न उधर के रहे, न ये हाथ आया न वह मिला

माया तेरे के तीन नाम, परसू, परसा, परसराम

मनुष्य की इज़्ज़त दौलत की वजह से होती है, जब ग़रीब था लोग परसू कहते थे, जब ज़रा मालदार हुआ तो परसा कहने लगे, और जब धनी हो गया तो प्रसराम कहलाने लगा

मा'ज़ूल शवंद मा'क़ूल शवंद

(फ़ारसी कहावत उर्दू में मुस्तामल) माज़ूल हो कर ठीक हो जाते हैं नहीं तो नशा चढ़ा रहता है

मच्छर छाँटे और ऊँट निगल जाए

थोड़े में रास्त बाज़ी और बहुत में बेईमानी

मछ्ली अपनी जान से गई , खाने वालों को मज़ा न आया

रुक : मुर्ग़ी अपनी जान से गई, खाने वालों को मज़ा ना आया, जो ज़्यादा मुस्तामल है

मछ्ली का खाना हर निवाले थू

बह मजबूरी कोई नागवार काम करने के मौक़ा पर कहते हैं

मछ्ली के भी पित्ता होता है

बेबस पीड़ित को भी कभी-कभी ग़ुस्सा आ जाता है

मछली के जाए को तैरना कौन सिखाए

योग्य व्यक्ति स्वयं होशियार अर्थात बुद्धिमान होते हैं, उन्हें ज्ञान की आवश्यक्ता नहीं होती

मछली सारे जल को गंदा करती है

जमात में एक शख़्स ख़राब हो तो पूरी जमात बदनाम होती है, घर के एक फ़र्द की बदआमाली से पूरा घराना रुसवा होता है

मछली सारे तालाब को गंदी करती है

जमात में एक शख़्स ख़राब हो तो पूरी जमात बदनाम होती है, घर के एक फ़र्द की बदआमाली से पूरा घराना रुसवा होता है

मछली तो नहीं कि सड़ जाएगी

अक्सर बेटी की शादी की निसबत बोलते हैं जिस से ये मुराद होती है कि जब तक अच्छा घर और अच्छा बर नहीं मिलेगा हम शादी नहीं करेंगे, बेटी है मछली तो नहीं है कि सड़ कर बिगड़ जाएगी

मछलियाँ तो नहीं कि सरा जाएँगी

ऐसी क्या जल्दी है, आमतौर पर बेटी की शादी के संबंध में कहते हैं

मगर वो बात कहाँ मौलवी मदन की सी

अगरचे बहुत मेहनत और कोशिश से नक़ल उतारी है लेकिन फिर भी नक़ल में असल की सी ख़ूबी नहीं, नक़ल तो उतारी मगर असल जैसी नहीं

मग्घा में मरना, अगले जनम में गधा बनना

मगध में मरने से अगले जन्म में आदमी गधा होता है

मग्घा देश कनचन पूरी, देस अच्छा भाका बुरी

मगध देस और कंचन पूरी का इलाक़ा तो अच्छा है परंतु भाषा ख़राब है

मग़्ज़ को लगी तो एड़ियों में बुझी

बहुत अप्रिय होना, बहुत अधिक क्रोध आने पर प्रयुक्त

मह नौ मी शवद माह-ए-तमाम आहिस^ता आहिस^ता

(फ़ारसी कहावत उर्दू में मुस्तामल) नया चांद आहिस्ता आहिस्ता पूरा होजाता है, हर नाक़िस तरक़्क़ी करते करते कामिल हो जाता है, किसी को कमाल रफ़्ता रफ़्ता हासिल होता है

मह नूर मी फ़िशांद-ओ-सग बाँग मी ज़ंद

चाँद नूर बरसाता है और कुत्ता भौंकता है, ईर्ष्यालु और बुरा चाहने वाले शोर मचाते रहते हैं और काम करने वाले काम करते रहते हैं

महंगा रोए एक बार, सस्ता रोए बार बार

क़ीमती चीज़ में कोई ऐब नहीं होता इस लिए वो देर से ख़राब होती है, सस्ती चीज़ नाक़िस होने के सबब बार बार ख़राब होती रहती है , रुक : सस्ता रोय बार-बार, महंगा रोय एक बार

महावट बरसी और साढ़ी सरसी

माघ के महीने में वर्षा हो तो रबी' की फ़सल बहुत बढ़ती है

महल्ले में आई बरात, पड़ोसन को लगी घबराहट

वहाँ कहते हैं जहाँ कोई दूसरा अधिक अपनापन दिखाए

महीना पुराया और कमेरा घबराया

महीना पूरा होते ही मज़दूर को तनख़्वाह मिलती है इसलिए वह प्रसन्न होता है एवं समय पर न मिले तो घबराने लगता है

मैं और मेरा माँस तीसरे का मुँह भुलस

अधिक स्वार्थ के अवसर पर कहते हैं

मैं भली कि पैंठा

कौन ज़्यादा बेवक़ूफ़ है

मैं भली तू शाबाश

एक दूसरे की आलोचना

मैं भरूँ सरकार के, मेरे भरे सक़्क़ा

जो शख़्स ख़ुद तो किसी की ख़िदमत करे मगर अपना काम दूसरों से किराए इस के मुताल्लिक़ कहते हैं

मैं भी रानी तू भी रानी, कौन भरे नद्दी से पानी

सब ही धनवानों की पुत्रियाँ हों तो काम नहीं चल सकता

मैं डाल डाल, तू पात पात

में तुझ से कम चालाक नहीं, मुझ से बच कर नहीं जा सकता

मैं दूसरा मेरा भाई तीसरा हज्जाम नाई

उस समय प्रयुक्त है जब कोई व्यक्ति (प्रायः दावत में) बहुत से आदमी अपने साथ लेकर आए और यह प्रकट करे कि मेरे साथ तो बहुत कम आदमी हैं

मैं ही पाल किया मुस्टंडा मोहे ही मारे डंडा

माँ नाफ़रमान बेटे के मुताल्लिक़ कहती है कि मैंने उसे पाल पोस कर बड़ा किया है और अब ये मुझे मारने आया है

मैं हूँ ऐसी चातुर ज्ञानी चातुर भरे मेरे आगे पानी

में इतनी चालाक हूँ कि दूसरे चालाक मेरी ख़िदमत करते हैं, अपनी होशयारी और चालाकी ज़ाहिर करने के मौके़ पर कहते हैं

मैं करूँ भलाई, तू करे मेरी आँख में सलाई

उस अवसर पर बोला करते हैं जब कोई व्यक्ति किसी के उपकार करने के बदले उसके साथ बुराई करे

मैं के गर्दन में छुरी

चूँकि बकरी की आवाज़ भी में है और मैं घमंड के अर्थ में भी प्रयुक्त है

मैं की गर्दन में छुरी

अहंकारी सदैव नष्ट होता हैं, घमंडी हमेशा तबाह होता है

मैं मैं न जानों

काम बिगड़े या बने मुझ पर दोषी नहीं, मैं ज़िम्मेदारी से मुक्त हो गया, मैं क्या जनूं?

मैं मरूँ तेरे लिए, तू मरे वा के लिए

धोकेबाज़ है, मैं उस पर जान देता हूँ परंतु वह मेरे अतिरिक्त दूसरों पर अधिक ध्यान देता है

मैं न कहता था

में जो कहता था वही हुआ, मेरी बात सही थी

मैं न समझूँ तो भला क्या कोई समझाए मुझे

ज़िद्दी आदमी के मुताल्लिक़ कहते हैं, आदमी ख़ुद ना समझना चाहे तो कोई नहीं समझा सकता

मैं ने चार बरसातें ज़्यादा देखी हैं

यानी में तुम से ज़्यादा उम्र रसीदा और ज़्यादा तजरबाकार हूँ

मैं ने चुक़ंदर बोया और गाजर पैदा हो गई

अनहोनी बात , करना कुछ हो कुछ जाना

मैं राज़ी और मेरा ख़ुदा राज़ी

रुक : में ख़ुश मेरा ख़ुदा ख़ुश, किसी बात पर मुकम्मल रज़ा ज़ाहिर करने के लिए कहते हैं

मैं सहीह सलामत आई, राजा के चूतड़ कटा आई

कायर और चालाक व्यक्ति दूसरों को अपनी मुसीबत में फँसाता है (चिड़िया चिड़े की कहानी के बोल)

मैं तो डूबा मगर तुझ को भी ले डूबूँगा

अपने साथ दूसरों को भी मुसीबत में गिरफ़्तार करा देना

मैं तो तेरी लाल पगिया पर भूली रे राघोर

(ओ) ज़ाहिरी शान-ओ-शौकत से लोग धोका खा जाते हैं

मैं तुझे चाहूँ और तू काले ढींग को

जब कोई किसी को बुरे काम से रोके या मन' करे और वो न रुके तो कहते हैं

मैं तुम्हारी खिचड़ी खाऊँ तुम मेरा बच्चा खिलाओ

में बेवक़ूफ़ नहीं जो तुम्हारे दिए हुए थोड़े से के इव्ज़ अपना सब कुछ दे दूं

मैला तकिया उजला ग़िलाफ़

ऊपर से साफ़ अंदर से गंदा, बज़ाहिर कुछ बबातन कुछ , मुनाफ़िक़

मैले का भाई नौशादर

दोनों बराबर हैं जैसा यह वैसा वह, एक ही थैली के चट्टे बट्टे हैं

मैना जो मैं ना कहे दूध भात नित खाय, बकरी जो मैं मैं करे उलटी खाल खिंचाय

विनम्र व्यक्ति सम्मान पाता है और घमंड करने वाला हानि उठाता है

मजलिस में शेख़ शलेते में मेख़

दोनों ख़राबी करते हैं

मजनूँ को लैला का कुत्ता भी प्यारा

प्रेमी को अपनी प्रेमिका की ख़राब से ख़राब चीज़ भी अच्छी लगती है

मज्ज़ूब होना

वली होना, असर वाला होना । उसे तो मजज़ूब होना चाहिए

मख़मल में टाट का पैवंद

किसी आला चीज़ के साथ अदना का जोड़ हो या कोई बेजोड़, नामौज़ूं चीज़ हो तो इस के मुताल्लिक़ कहते हैं

मक्का गए न मदीना गए बीच ही बीच में पयम्बर बहे

बिना मेहनत-ओ-मशक़्क़त अपना काम कर लिया

मक्का में रहते हैं पर हज नहीं किया

अभागा हर जगह वंचित रहता है

मक्के गए न मदीने गए, बीच ही बीच में हाजी भए

बे मेहनत-ओ-मशक़्क़त अपना काम पूरा कर लिया

मक्खी छोड़ना और हाथी निगलना

धूर्त के लिए कहते हैं जो ऊँचा हाथ मारे

मक्खी मार बड़ा चमार

कंजूस बहुत अपमानित होता है

मक्र चक्र की कहानी, आधा दूध आधा पानी

धोखे की बातें हैं जिन में सच के साथ झूठ मिला हुआ है

मक्र-चक्र चलना

शोख़ी निगाह का इज़हार, निहायत शोख़ दीदा होना

मलंग का और बामनी का क्या साथ

दो ग़ैर जिन्स के मेल का नतीजा फ़साद ही होता है

मलक-उल-मौत ने घर देख लिया

मुसीबत को यहां तक पहुंचने का रास्ता मालूम होगया, आफ़त मानूस हो गई (जब ये कहना मक़सूद हो कि इस दफ़ा की मुसीबत या आफ़त का ग़म नहीं, फ़िक्र इस बात की है कि जब एक दफ़ा ऐसी मुसीबत या परेशानी आई तो दुबारा ना आजाए, तो ये मक़ूला कहते हैं)

मल्लाह दर चीन व कश्ती दर फ़रंग

(फ़ारसी कहावत उर्दू में मुस्तामल) दो ला ताल्लुक़ चीज़ों में बड़ा फ़ासिला और दूरी होती है

मल्लाह का लँगोटा ही भीगता है

क्यूँकि वह कोई और कपड़ा ही नहीं पहनता

मल्लाही की मल्लाही बाँस के बाँस

दुहरा नुक़्सान उठाया

मल्लाही की मल्लाही दी, बाँस के बाँस खाए

एक हानि की जगह कई हानि उठाए

मल्लाही मुफ़्त दी, बाँस घाते में खाए

एक नुक़्सान की जगह कई नुक़्सान उठाए

मन 'अरफ़ा नफ़्सहु फ़क़द 'अरफ़ा रब्बहु

(अरबी फ़िक़रा (हदीस) उर्दू में बतौर कहावत मुस्तामल) जो अपने नफ़स की हैसियत को पहचान ले वो अल्लाह ताला के मरतबे को पहचान सकता है, इरफान-ए-बारी ताला के लिए अव्वल इरफान-ए-ज़ात ज़रूरी है

मन अटका तन झटका

इशक़ आदमी को घुला देता है, मुहब्बत की यही तासीर है

मन भाए मुंडिया हिलाए

दिल तो चाहता है मगर ऊपरी दिल से इनकार है, ज़ाहिरन नफ़रत बातिनन रग़बत , रुक : मन चाहे मंडया हिलाए, जो ज़्यादा मुस्तामल है

मन भाए तो ढेला सपारी

जिस चीज़ को दिल चाहे वो अच्छी मालूम होती है

मन भाए , मुंडिया हिलाए

रुक : मन चाहे मंडया हिलाए जो ज़्यादा मुस्तामल है

मन भाता खाइए, जग भाता पहनये

खाना वो खाईए जो दिल को मर्ग़ूब हो और लिबास वो पहनना चाहिए जो दूसरों को पसंद हो , रुक : खाए मन भाता, पहने जग भाता

मन भावे मुंडिया हिलावे

दिल तो चाहता है मगर ऊपरी दिल से इनकार है, ज़ाहिरन नफ़रत बातिनन रग़बत , रुक : मन चाहे मंडया हिलाए, जो ज़्यादा मुस्तामल है

मन भर का सर हिलाते हैं , पैसा भर की ज़बान नहीं हिलाई जाती

इस के मुताल्लिक़ कहते हैं जो सलाम के जवाब में सिर्फ़ सर हिला दे , मग़रूर और बेवक़ूफ़ के मुताल्लिक़ कहते हैं

मन भर का सर हिलाते हैं , पैसा भर की ज़बान नहीं हिलते

इशारे से कहते हैं ज़बान से नहीं बोलते, साफ़ साफ़ नहीं कहते

मन चंगा तो कठौती में गंगा

यदि मन शुद्ध है अथवा अगर शरीर स्वस्थ है तो घर में ही गंगा है

मन चाहे मुंडिया हिलाए

दिल तो चाहता है मगर ऊपरी दिल से इनकार है, ज़ाहिरन नफ़रत बातिनन रग़बत

मन चलता है, टट्टू नहीं चलता

कोई उपाय बन नहीं पड़ता, हिम्मत है सामर्थ्य नहीं

मन चंचल करम दलिद्री

दिल में धन-संपन्नता परंतु भाग्यवान नहीं, दिल अमीर है मगर भाग्य बुरी है अर्थात निर्धनता है

मन गुफ़्तम व मुहावरा शुद

(फ़ारसी कहावत उर्दू में मुस्तामल) मैंने कहा और मुहावरा बिन गया, ज़बान दानी की तारीफ़ में मुस्तामल, जिस शख़्स का क़ौल हर शख़्स शुद मान ले

मन 'इल्म और दस मन 'अक़्ल

इलम से मुस्तफ़ीद होने के लिए तजुर्बे के ज़रूरत है, (फ़ारसी) 'बिक मन इलम रा दह मन अक़ल बायद' का तर्जुमा)

मन जाने पाप, माई जाने न बाप

मनुष्य अपने पापों को स्वयं भली भाँति जानता है, माँ-बाप नहीं जानते

मन जर्रबल मुजर्रबा हल्लत बिहिन्नदामा

(अरबी मक़ूला उर्दू में बतौर कहावत मुस्तामल) जो शख़्स आज़माई होई बात को आज़माता है उसे नदामत होती है/शर्मिंदगी उठाना पड़ती है

मन जर्रबल मुजर्रबा सिल्लत बिहीन्नदामा

(अरबी मक़ूला उर्दू में बतौर कहावत मुस्तामल) जो शख़्स आज़माई होई बात को आज़माता है उसे नदामत होती है/शर्मिंदगी उठाना पड़ती है

मन का अंकुस ज्ञान

ज्ञान दिल को स्वच्छ रखता है

मन का आँकस गया

علم ضمیر دل کو ٹھیک رکھتا ہے

मन करे पहिरन चौतार करम लिखे भेड़ी के बार

दिल तो अच्छे कपड़े पहनने को करता है मगर भाग्य में भेड़ के बाल हैं

मन के लड्डुओं से भूक नहीं मिटती

मीठी मीठी बातों का कोई फ़ायदा नहीं, उन से ज़रूरत पूरी नहीं होती

मन ख़ूब मी-शनासम पीरान-ए-पारसा रा

(फ़ारसी कहावत उर्दू में मुस्तामल) ज़ाहिर में कैसे नेक बिन रहे हो मगर में ख़ूब पहचानता हूँ कि तुम्हारा किरदार किया है, किसी के कार-ए-नामुनासिब पर तान के मौक़ा पर मुस्तामल

मन की मुर्री किस से कहूँ पेट मसोसा दे दे रहूँ

अपना दुख या भूक किस से कहूँ पेट दबा कर चुप हो रहती हूँ

मन को भाए मुंडिया हिलाए

रुक : मन चाहे मंडया हिलाए

मन को भाए तो ढेला भी सुपारी है

जिस वस्तु को दिल चाहे वही भली प्रतीत होती है

मन ललचाए मुंडिया हिलाए

रुक : मन चाहे मंडया हिलाए जो ज़्यादा मुस्तामल है

मन माने घर जाने

अपनी इच्छा का स्वयं मालिक है, जहाँ चाहे जा सकता है

मन मानी अंजानी

दिल में जानता है, दिखाने को अपनी अज्ञानता दर्शाता है, ऊपर से अंजान बनता है

मन मानी घर जानी

ख़ुदमुख़तारी, बेजा ज़िद, आज़ाद है जो दिल चाहे सौ करता है

मन मलीन सुन्दर तन कैसे, बिख रस भरा कनक घट जैसे

कपटी एवं धोखेबाज़ के संबंध में कहते हैं

मन मौजी, जोरू को कहें भौजी

मूर्ख व्यक्ति बिना अवसर बात करता है

मन में बसी , सीने में धंसी

जो बात दिल को पसंद आजाए इस का ख़्याल हरवक़त रहता है

मन में गाँती टसटस रोवे, चूहा ख़सम कर सुख से सोवे

दिखाने को रोती है दिल में प्रसन्न है क्यूँकि पति बच्चा है इस लिए कोई रोक टोक करने वाला नहीं है

मन में मूर्ख़ जून में दुखी कोई नहीं

किसी को अपना जीवन भारी नहीं होता

मन में शैख़ फ़रीद, बग़ल में ईंटें

बाहर कुछ अंदर कुछ, दिखावा करते हैं, ढोंगी हैं

मन मिले का मेला, चित मिले का चेला

अंदर की सफ़ाई से काम चलता है केवल बाहर की सफ़ाई से कुछ नहीं होता

मन मोतियों ब्याह, मन चावलों ब्याह

ख़र्च बहुत करो या थोड़ा काम हो ही जाता है

मन साँचा तो सब साँचा

नीयत सही हो तो नतीजा अच्छा निकलता है , सच्चाई अजब चीज़ है, सच्च बोल कर ऐसा महसूस होता है जैसे सारी दुनिया ख़ुश है, सिदक़ दिल अजब शैय है

मन तशब्बहा बिक़ौमिन

अरबी फ़िक़रा (हदीस) बतौर कहावत उर्दू में मुस्तामल, जो अपने अक़्वाल और अफ़आल में किसी क़ौम का मुशाबेह बनेगा वो उन्ही में शुमार होगा

मन ज़ाक़ा ज़ाक़

(अरबी फ़िक़रा उर्दू में बतौर कहावत मुस्तामल) जिस पर गुज़रे वही जानता है

मन ज़हिका ज़ुहिका

जो दूसरों पर हँसता है उस पर दूसरे हँसते हैं, जो हँसा वह हँसा गया

मन-दानम-ओ-कार-ए-मन

(फ़ारसी फ़िक़रा उर्दू में बतौर कहावत मुस्तामल) में अपने फ़र्ज़ का ख़ुद ज़िम्मेदार हूँ, चू कुछ करना चाहिए वो में ख़ुद कर लूंगा

मन-दीगरम-तू-दीगरी

(फ़ारसी कहावत उर्दू में मुस्तामल) में और हूँ तो और है, मुझ में तुझ में फ़र्क़ है

मंदिर माँ सभी साँच से राखो दीपक बाल, साँझ अँधेरे बैठना है इती भौंडी चाल

सर-ए-शाम घर में चिराग़ जलाना चाहिए, क्योंकि शाम ही से अंधेरे में बैठ रहना बहुत भिवंडी बात है

मंदिर माँ सभी साँझ से राखो दीपक बाल, साँझ अँधेरे बैठना है इती भौंडी चाल

सर-ए-शाम घर में चिराग़ जलाना चाहिए, क्योंकि शाम ही से अंधेरे में बैठ रहना बहुत भिवंडी बात है

मंडवे के आटे में शर्त क्या

सस्ती चीज़ के अच्छे होने की दुकानदार क्या शर्त करे वह तो जान-मान कर ख़राब होगी ही

मन-तू-शुदम-तू-मन-शुदी

(उर्दू में प्रयुक्त फ़ारसी कहावत) दोनों दो शरीर एक जान हो गए, दो शरीर एक जान होना एक होने के अवसर पर कहा जाता है

मनुष की पहचान को मु'आमला कसौटी है

काम पड़ने पर ही मनुष्य की परख होती है

मन्वा मर गया, खेल बिगड़ गया

दिल टूट जाये तो बहुत काम बिगड़ जाते हैं

मक़ाम-ए-'ऐश मयस्सर नमी शवद बे रंज

(फ़ारसी कहावत उर्दू में मुस्तामल) आराम की जगह बगै़र तकलीफ़ उठाए नहीं मिलती, तकलीफ़ के बगै़र नहीं मलतय

मक़दूर की माँ गोड़े ही रगड़ती है

तुम्हारा कुछ ज़ोर नहीं चलेगा, तुम कुछ नहीं बना सकते

मर गए मर्दूद जिन की फ़ातिहा न दुरूद

दुष्ट मर गया, मरने पर जिसका कोई क्रिया-कर्म नहीं हुआ, एक प्रकार की गाली

मर गया मर्दूद जिस का फ़ातिहा न दुरूद

निकम्मे व्यक्ति के बारे में उपयोगित, बदमाश और बुरे आदमी को कोई शुभ नाम से याद नहीं करता

मर जाएँ तो मक्खी और निकल जाएँ तो शेर

अगर कोई क़ैदी जेल में मर जाये तो एक मक्खी के मर जाने से ज़्यादा एहमीयत नहीं दी जाएगी लेकिन अगर कोई क़ैदी भाग निकलने में कामयाब हुआ तो उसे एक शेर के कटहरे से निकल जाने के बराबर अहम वाक़िया समझा जाएगा

मर मर डोम गीत गावे, दतार को हँसी आवे

डोम तो मेहनत कर के मर रहा है, सुनने वाले को पसंद नहीं आता, किसी को ख़ुश करना बहुत मुश्किल है ख़सूसन जिस से कुछ लेना हो

मर मर न जाते तो भर घर होते

मृत्यु ने ख़ानदान को बर्बाद कर दिया वर्ना घर भरा होता

मरा चोर पराए धन पर

पराए माल पर जान देना हमाक़त है , बेवक़ूफ़ दूसरों के माल पर जान देता है

मरा हाथी भी सवा लाख का होता हे

कारआमद और क़ीमती चीज़ की निसबत कहते हैं, अच्छी और मुफ़ीद चीज़ की क़दर हमेशा रहती है

मरा रावण, फ़ज़ीहत हो

अत्याचारी मर कर भी अपमानित होता है, अत्याचारी अपमानित हो कर मरता है

मरा तो शहीद , मारा तो ग़ाज़ी

जिहाद करने वाला अगर मर गया तो शहीद कहलाया और अगर किसी काफ़िर को मार डाला तो ग़ाज़ी कहलाता है

मरा-सोता-बराबर

मुर्दे और सोए हुए शख़्स में कोई फ़र्क़ नहीं होता

मर्द 'औरत राज़ी तो क्या करे क़ाज़ी

रुक : मियां बीवी राज़ी (अलख) जो ज़्यादा मुस्तामल है

मर्द बायद कि गीरद अंदर गोश, अज़ नविश्त अस्त पंद बर दीवार

(फ़ारसी कहावत उर्दू में मुस्तामल) आदमी को चाहिए कि नसीहत सन ले चाहे दीवार पर लिखी हो, यानी अच्छी बात जिस तरह भी मालूम हो और जिस से भी मालूम हो उसे याद रखना चाहिए और इस पर अमल करना चाहिए

मर्द बायद कि हरासाँ न शवद , मुश्किले नीस्त कि आसाँ न शवद

(फ़ारसी शेअर उर्दू में बतौर मक़ूला मुस्तामल) आदमी को चाहिए कि हिरासाँ ना हो, कोई मुश्किल ऐसी नहीं है कि जो आसां ना हो जाये

मर्द बे-ज़र हमेशा रंजूर अस्त

(फ़ारसी कहावत उर्दू में मुस्तामल) मुफ़लिस आदमी हमेशा परेशान रहता है

मर्द चौपैर शवद हिर्स जवाँ मी गर्द

बुढ़ापे में लालच ज़्यादा होती है

मर्द चूँ पीर शवद , हिर्स जवाँ मी गर्दद

(फ़ारसी कहावत उर्दू में मुस्तामल) बुढ़ापे में हिर्स ज़्यादा होती है

मर्द जेकड़ा गाँठ रूपया

मर्द वो है जिस के पास रुपया है

मर्द जो मुँह से कहते हैं वही बात करते हैं

शरीफ़ आदमी अपनी बात से नहीं हटते हैं

मर्द का दिखाया न खाइए, मर्द का लाया खाइए

मुम्किन है कि मर्द अपनी शान दिखलाने को कुछ बढ़ कर बताए इस का एतबार ना करें , औरतों के लिए नसीहत है कि मर्द के सामने खाना ना चाहिए जो कुछ वो ले आए वो खाना चाहिए

मर्द का हाथ फिरा और 'औरत उभरी

मर्द का हाथ लगने से औरत के चूची बढ़ने शुरू होते हैं

मर्द का हाथ फिरा और उभरी

मर्द के हाथ लगने से औरत जलद बढ़ती और जवान होती है

मर्द का क्या है एक जूती पहनी एक उतार दी

मर्द जब चाहे औरत को तलाक़ दे दे, मर्द के नज़दीक औरत की हैसियत जूती की सी है

मर्द का नाम मर्द से बेहतर है

आदमी से ज़्यादा उसका नाम प्रभावशाली होता है, मर्द से ज़्यादा उस के नाम का रोब या असर होता है

मर्द का नहाना , 'औरत का खाना बराबर है

दोनों इन कामों में जल्दी करते हैं यानी मर्द नहाता जलद है और औरत खाती जलद है

मर्द के चार निकाह दुरुस्त हैं

इस्लामिक कानून के मुताबिक, मुस्लिमों में एक आदमी एक ही समय में चार पत्नियां रख सकता है

मर्द की बात और गाड़ी का पहिया आगे चलता है

शरीफ़ अपने स्वीकृति अर्थात वचन से फिरते नहीं हैं, शरीफ़ जो वचन देता है उसे अवश्य पूरा करता है

मर्द की बात हाथी का दाँत है

सज्जन लोग अपनी बात से नहीं पीछे हटते हैं

मर्द की मौत ना-मर्द के हाथ

कभी कमज़ोर आदमी ताक़तवर आदमी को मार लेता है, कभी कमज़ोर भी ज़बरदस्त को मार लेता है

मर्द को गर्द ज़रूर है

आदमी को मेहनत करनी पड़ती है

मर्द को ना मर्द मारे बनिए को

नामर्द कमज़ोर से लड़ता है

मर्द मानुस घर ही भले

महिलाओं की संतुष्टि एक पुरुष के घर में रहने में है, मर्दों को ज़्यादा वक़्त घर ही में रहना चाहिए

मर्द मरे नाम को, ना-मर्द मरे नान को

वीर पुरुष को नाम प्यारा होता है और क़ायर को रोटी

मर्द सब को मर्द करता है

एक बहादुर हो तो इस की देखा देखी दूसरे भी बहादुर बिन जाते हैं, एक अहल हो तो इस की अहलीयत का दूसरे साथीयों पर भी असर पड़ता है

मर्द वो है जो दे और न ले, और नीम मर्द वो है जो दे और ले, ना-मर्द वो है जो न दे और न ले

बुज़ुर्गों का क़ौल है कि बहादुर वो है जो देता है यानी सख़ावत करता है मगर किसी से लेता नहीं, नीम बहादुर वो है जो देता भी है और लेता भी, बुज़दिल और नालायक़ वो है जो लेता तो है मगर देता किसी को नहीं

मर्द-ए-बे-तोशा बर-गाम

(फ़ारसी कहावत उर्दू में मुस्तामल) बगै़र ग़िज़ा के हाथ पैर काम नहीं करते

मर्द-ए-बे-तोशा नगीरद गाम

(फ़ारसी कहावत उर्दू में मुस्तामल) बगै़र ग़िज़ा के हाथ पैर काम नहीं करते

मर्दों का एक क़ौल होता है

मर्द जो कहते हैं वो करते हैं और अपनी बात पर क़ायम रहते हैं

मरे बावा की बड़ी बड़ी आँखें

बाद इवफ़ात बुज़ुर्ग की बज़रगदाशत ज़्यादा करना

मरे चोर पराए धन

जो दूसरों की संपत्ति निहारता है वह चोर है

मरे चोर पराए धन पर

पराए माल की ख़ातिर जान देना हमाक़त है, बेगाना माल मारना आसान नहीं, चोर पराए माल पर अपनी जान खो देता है

मरे घोड़े का ना'ल नफ़ा'

जाती चीज़ में से जो हासिल हो जाये वही सही

मरे हुए बैल के बड़े बड़े दीदे

रुक : मरे बावा की बड़ी बड़ी आँखें

मरे हुओं पर मत रोओ बल्कि बेवक़ूफ़ों पर गिर्या करो

(तुर्की कहावत उर्दू में मुस्तामल) । मुरदे को रोने से बेहतर है बेवक़ूफ़ की बेवक़ूफ़ी का मातम करें

मरे का कोई नहीं, जीते जी के सब लागू हैं

धनवान के सब साथी हैं निर्धन को कोई नहीं पूछता

मरे को मारे शाह मदार

दुखिया को भगवान और भी दुख देता है

मरे को मारे शामत-ज़दा

रुक : मरे को मारें शाह मदार जो ज़्यादा मुस्तामल है

मरे को मर जाने दे, हल्वा पूरी खाने दे

स्वार्थी अपना ही लाभ चाहता है

मरे माँ , जीवे मासी

अगर माँ मर जाये और ख़ाला जीती रहे तो बच्चे पुल जाते हैं क्योंकि उस की मुहब्बत भी माँ के बराबर होती है

मरे न जिए बकर बकर करे

रुक : मरे ना पीछा छोड़े, जो आदमी हरवक़त तंग करे उसे भी कहते हैं, जब तक ज़िंदा है तंग करेगा

मरे न जिए हकर हकर करे

रुक : मरे ना पीछा छोड़े, जो आदमी हरवक़त तंग करे इस के मुताल्लिक़ कहते हैं, जब तक ज़िंदा है तंग करेगा

मरे पर सौ दुर्रे

पहले ही मुसीबत थी उस पर एक और मुसीबत आ गई, मुसीबत पर मुसीबत

मरे पे बेद

वक़्त गुज़र जाने पर कोशिश करने के मौके़ पर कहते हैं

मरे तो शहीद, मारे तो ग़ाज़ी

मुसलमान हर स्थिति में लाभ में रहता है

मर्ग-ए-अंबोह जश्न-ए-दारद

फ़ारसी कहावत उर्दू में प्रयुक्त

मरिहों पर टरिहों नहीं

मर जाऊँ परंतु अपनी बात से न टलूँ

मरी जब दम न आया

जब पूरी तबाही हो गई तब आपको मालूम हुआ

मरी क्यों, साँस न आया

इज़हार-ए-मुसीबत के वक़्त बोलते हैं

मरखना बैल जी का जलापा

मुराद ये है कि ना तो इस का कोई ख़रीदार होता है और ना ही इस को कोई पाल सकता है

मर-मर बुढ़िया गीत गावे, भोले लोग तमाशे आवें

किसी आदमी के बहुत मुश्किल से कोई काम करने पर दूसरे बहुत से लोगों के हँसने के मौके़ पर बोलते हैं

मरना भला बदेस का जहाँ न अपना कोई

परदेस में मरना बेहतर है कि वहां कोई अपना नहीं होता जो अफ़सोस करे

मरना है बद नेक को जीना नाप सदा, बेहतर है जो जगत में नेक नाम रह जा

अच्छे काम करने चाहिए ताकि दुनिया में रह जाए, वैसे तो अच्छे बुरे सब को मरना है

मरना-जीना सब के साथ है

दुनिया के झगड़े बखेड़े किसी को नहीं छोड़ते

मरने जाएँ , मलारें गाएँ

ऐसे बेफ़िकर आदमी हैं कि मरने को भी खेल समझ कर गीत गाते हैं, बेपर्वा और आज़ाद तबा नीज़ शेखी ख़ोरे की निसबत बोलते हैं

मरने को चले, कफ़न का टूटा

बहाने-बाज़ व्यक्ति के प्रति बोलते हैं

मरने को क्या हाथी घोड़े जुड़ते हैं

जब चाहे तब मर जाए, उपेक्षा-पूर्वक कहते हैं

मरने पे डोम राजा

हिंदुओं में जब कोई मर जाता है तो मृत्यु शोक के समय पहले शब्द डोमनी बोलती है, मौत पर कमीने लोगों का फ़ायदा होता है

मरने से क्या डरना

मौत से किसी तरह छुटकारा नहीं हो सकता इस लिए इससे डरना नहीं चाहिए

मरो या जियो हम को अपने हलवे माँडे से मतलब है

स्वार्थी का कहना कि चाहे कोई मरे या जिये उन का फ़ायदा हो

मरता क्या न करता

उस व्यक्ति के लिए बोलते हैं जो अपने जीवन से निराश हो कर जो चाहे करे

मरते हैं मरते पर न राह चलते पर

प्यार और मोहब्बत अपनों से होता है न कि दूसरों या अजनबियों से

मरते हज़ारों को सुना , जनाज़ा कसी का न देखा

महिज़ बलंद बाँग दावे करना और अमल कुछ ना करना

मरते जाएँ मलहारें गाएँ

मुश्किलों में भी ज़िंदगी से लुतफ़ लें

मरते के साथ कौन मरता है

मुसीबत के वक़्त कोई किसी का साथ नहीं देता

मरते के साथ मरा नहीं जाता

किसी प्रियजन की मृत्यु के कारण दुनिया के धंधे नहीं छूटते

मरते को मारे शामत-ज़दा

निर्धन को हर व्यक्ति सताता है, मुसीबत पर मुसीबत आती है

मरते को मारें शाह मदार

हमेशा ग़रीब ही की शामत आती है, जिस वक़्त ग़रीब आदमी पर कोई मुसीबत पड़ती है इस मौके़ पर बोलते हैं

मरते को मर जाने दे हलवा पूरी खाने दे

मतलबी अपना ही फ़ायदा चाहता है

मरते मर गए, चोंचलों से न गए

बेइज़्ज़त होकर भी ग़रूर ना गया

मरते पर कोई मरता है

(ओ) जो ख़ुद किसी पर आशिक़ हो इस पर रीझना अपनी जान तहलके में डालना है

मरते सब को देखा , जनाज़ा किसी का नहीं देखा

आशिक़ी जताने और सिर्फ़ दावा करने वाले की निसबत कहते हैं

मर्ज़ी मौला अज़ हमा औला

हर मुआमले में ख़ुदा की रज़ा पर राज़ी रहना चाहिए, मालिक की रज़ा सब से बेहतर है (किसी मुआमले में इंसान की बेबसी के मौक़ा पर मुस्तामल)

मश'अल के नीचे से निकला हुआ है

(बाज़ारी) ज़नानों अर्थात हिजड़ों के साथ नाचा हुआ है, नचनिया

मश'अल की बू दिमाग़ में समाई है

ग़रीबी में अहंकार रखता है, रस्सी जल गई बल नहीं गया

मश'अल्ची आप ही अंधा है

दूसरों को सलाह दे और स्वयं कार्य न करें, दूसरों का मार्गदर्शन करना स्वयं भटका हुआ होना

मश'अल्ची अंधा होता है

उस व्यक्ति के प्रति कहते हैं जो दूसरों को रास्ता दिखाए और स्वयं रास्ते से भटका हुआ हो

मसीत ढे गई मेहराब रह गई

रुक : मस्जिद ढय् गई महिराब रह गई

मस्जिद ढे गई , मेहराब रह गई

कल में से जुज़ु बाक़ी है , आला जाता रहे अदना रह जाये, असली जाता रहे और नाम रह जाये तो कहते हैं

मत बो चाबड़ उजड़े टाबर

पथरीली ज़मीन में कुछ बौना नहीं चाहिए, सख़्त नुक़्सान होता है

मत कर सास बुराई तेरे भी आगे जाई

बहू सास से कहती है कि तू मेरे साथ बुराई करती है हालाँकि तेरी भी बेटी है और जैसा तू मेरे साथ करती है वैसा कोई तेरी बेटी के साथ करेगा

मत कर वार जो भुगते कार

जब तक आसानी से काम निकले सख़्ती नहीं करनी चाहिए, जब तक काम चले बिगाड़ नहीं करना चाहिए

मतर्स अज़ बलाए कि शब दर्मियानस्त

उस मुसीबत की चिंता में परेशान नहीं होना चाहिए जो अभी आई नहीं है

मतलब-ए-सा'दी दीगर अस्त

सादी का मतलब दूसरा है यानी ज़ाहिर यूं है मगर दिली मक़सद कुछ और है

मौला हाथ बड़ाइयाँ, जिस चाहे तिस दे

दूसरे के हाथ की बात है वह चाहे जो करे हम क्या कर सकते हैं? ऐसा भाव प्रकट करने के लिए कहते हैं

मौला यार तो बेड़ा पार

ईश्वर दया या कृपा करे तो सारी दुविधाएँ दूर हो जाती हैं

मौलवी हड्डा न काँप न ठड्डा

(तंज़न) मियां जी, मुस्लमान

मौसी का घर नहीं है

ख़ाला जी का घर नहीं है, आसान काम नहीं है, खेल नहीं है, किसी की सहजता और लापरवाही देखकर कहते हैं

मौत अंधी होती है

मृत्यु प्रत्येक को अवश्य आनी है, मौत हर एक को ज़रूर आनी है, जो पैदा हुआ उसे मरना भी है

मौत और गाहक का कोई ए'तिबार नहीं

मरने के लिए हर वक़्त तैयार रहना चाहिए मालूम नहीं किस वक़्त मौत आ जाए यही हाल गाहक का है इस लिए दुकानदार को भी हर वक़्त दुकान पर मौजूद रहना चाहिए

मौत-बर-हक़ है

मौत सच्च है, मौत का वक़्त मुक़र्रर है, मौत को कोई टाल नहीं सकता, मौत लाज़िमन आएगी इस से बचा नहीं जा सकता

मौत भली कि जान कंदनी

नज़ा की तकलीफ़ से मौत बेहतर है, रोज़ रोज़ की तकलीफ़ और उलझन से तो मर जाना ही बेहतर है

मौत भली की जान कुंदनी

रोज़ रोज़ की तकलीफ़ से मर जाना ही बेहतर है

मौत दीजो पर मोर न दीजो

बाज़ार के सस्ता होने से मृत्यु अच्छी है

मौत घात में है

मौत तलाश में है, मौत बहाना ढूँढती है

मौत हक़ है

मौत सच है, मौत अटल सत्य है, मौत अवश्य आएगी उससे बचा नहीं जा सकता

मौत का घर घाट नहीं

मौत हर जगह आती है, इसका कोई स्थान नहीं है

मौत कहो तो बीमारी मानता है

मुश्किल काम को करेंगे तो आसान काम पर संतुष्ट होंगे

मौत के आगे किसी का बस नहीं चलता, मौत के आगे सब हारे

मृत्यु से कोई नहीं बच सकता, मृत्यु सब को हरा देती है, प्रत्येक जीव को मरना है, मृत्यु से कोई नहीं बच सकता, मौत से कोई नहीं बच सकता, हर जानदार को मरना है, कोई मौत से नहीं बच सकता

मौत की दारू कोई नहीं

मृत्यु का कोई 'इलाज नहीं है, हर व्यक्ति को मरना है

मौत की घड़ी सर पर खड़ी है

मृत्यु हमेशा पास होती है, मृत्यु किसी समय आ जाएगी

मौत को पकड़ा तो बुख़ार पर राज़ी हुआ

मुश्किल काम पर पकड़ेंगे तो आसान काम पर राज़ी होगा, जब आदमी बड़ी मुसीबत में गिरफ़्तार होता है तो थोड़े से दुख और मेहनत को समझता हय

मौत को पकड़ा तो ज़हमत क़ुबूल की

इंसान की फ़ित्रत है कि मुश्किल काम पर मजबूर करेंगे तो इस से आसान काम राज़ी होगा

मौत नहीं ज़हमत है

अधिकार नहीं मारा जाता किंतु देर है, हक़ नहीं मारा जाता देर अलबत्ता है

मौत सर पर खेलती है

मौत हर वक़्त क़रीब है किसी वक़्त आ जाए

मौत से मफ़र नहीं

मरने से कोई नहीं बच सकता, सब को नष्ट होना है

मय्या बाबा मर गए, यही दहरया कर गए

बे सोचे समझे दुख़तर, बेटी को किसी बदमिज़ाज के साथ ब्याहना

मय्या बाहा मर गए, यही दहरिया कर गए

बिना सोचे-समझे लड़की को बुरे स्वभाव के साथ रहना

मय्या बावा मर गए, इसी घर का कर गए

U2H translate Method Index was outside the bounds of the array.

मज़दूर को शहर, भैंस को डहर

हर किसी को वो बात पसंद होती है जिस में इस का फ़ायदा हो

मेंडक चले मदारों को

कमीने या निकम्मे आदमी ने भी बड़ा हौसला किया

मेंडकी को ज़ुकाम हुआ

अपनी हद से बढ़ कर शेखी मारने वाले की निसबत बोलते हैं

मेंह बरसे गा तो बौछाड़ तो आएगी

आपके अपनों के पास धन है तो कुछ न कुछ लाभ हो ही जाएगा

मेंह का लड़का और नौकरी घड़ी घर ही नहीं हुआ करते

यह चीज़ें बहुत मुश्किल से मिलती हैं

मेंह कहता है आज बरस के फिर न बरसूँगा

मुतवातिर देर तक बहुत तेज़ बारिश होना

मेंहदी तो पाँव में नहीं लगी है

आते क्यों नहीं बहाने बनाते हो

मेहर गई मोहब्बत गई गए नान और पान, हुक़्क़े से मुँह झुलस के विदा' किया मेहमान

मेहमान का आदर सम्मान कुछ नहीं किया, केवल बातों में टाल दिया

मेहर तो बहुत है पर छातियों में दूध नहीं

ज़बानी आवभगत है देने लेने को कुछ नहीं

मेहमान और बुख़ार को अगर खाना न दो तो फि नहीं आते

फ़ाक़े से बुख़ार में फ़ायदा रहता है और मेहमान को खाना ना मिले तो बार बार नहीं आता

मेहनत आराम की कुंजी है

परिश्रम से ही सुख मिलता है

मेहनत कर के मरग़ा मरे, बच्चे खाए बिलाई

मशक़्क़त से माल कोई जमा करे उड़ा दे कोई, मेहनत कोई करे और फ़ायदा कोई उठाए तो कहते हैं

मेहनत को राहत है

मेहनत करने से आराम मिलता है, बिना मेहनत के प्रगति नहीं होती

मेहर करे तो बरसावे

ईश्वर की कृपा से ही सब कुछ होता है

मेहर करे तो फिर भरा दे

ख़ुदा मेहरबानी करे तो नुक़्सान के बाद देता है

मेहर तो है पर दूध नहीं

खाली आवभगत है लेना-देना कुछ नहीं, रूखी फीकी मुहब्बत है

मेले में जो जाए तू नावां कर में टाँक, चोर जुवारी गठ-कटे डाल सकें न आँख

मेले में जाए तो रुपया-पैसा ऐसी जगह रखे जहाँ किसी की नज़र न पड़ सके

मेरा बाप सख़ी था पराए बर्दे आज़ाद करता था

व्यंगात्मक तौर पर शेखी बघारने वाले के संबंध में बोलते हैं जो आप तो किसी योग्य न हो और बुज़ुर्गों की बातों पर घमंड करे

मेरा बैल मंतिक़ नहीं पढ़ा

जानवर को अय्यारी नहीं आती नीज़ हम फ़ुज़ूल काम नहीं करते

मेरा दिल बे-दिल हुवा देख जगत की रेत

ऐसे मनुष्य का कहना जो दुनिया के हाल-चाल देख कर विरक्त हो रहा है

मेरे ब्याह जी जी के ठिक ठिक

काम किसी का प्रसन्नता कोई करता है

मेरे चारों पल्ले कीचड़ में हैं

दुनिया की चिंताओं में फँसा हुआ हूँ

मेरे दोनों मीठे

जब किसी को दोहरी नेअमत मिले या दोनों चीज़ें अज़ीज़ हूँ तो कहते हैं

मेरे घर अन्ना , दूसरे रवन्ना

हमारे घर थोड़े से नौकर चाकर हैं, हमारे हाँ कुछ ज़्यादा साज़ो सामान नहीं

मेरे ही से आग लाई नाम रखा बी संदर

यानी अपने ही वाक़िफ़ कार और मुहर्रम इसरार से झूट बोलना और पर्दा करना, जिस से लेना इसी के आगे शीख़ीबघारना

मेरे लाल के सौ सौ यार , धनिया , जुलाहे और मिनहार

मेरे बेटे के दोस्त तो बहुत हैं मगर हैं सब निकम्मे और कमीने, जिस के दोस्त नालायक़ हूँ इस के मुताल्लिक़ कहते हैं

मेरे लाला की उल्टी रीत सावन मास उठावें भीत

हमारे पुत्र की मत ही निराली है कुछ आगे पीछे नहीं सोचते

मेरे मियाँ के दो कपड़े, सुत्थन नाड़ा और बस

कोई स्त्री अपने अकर्मण्य पति का मज़ाक उड़ा रही है कि उसके पास पैजामा और नाड़ा बस ये ही दो कपड़े हैं

मेरे मुँह में साँप काटे

औरतें क़िस्म खाते वक़्त कहती हैं, मेरा बुरा हो, मुझे सज़ा मिले

मेरे पूत की लंबी लंबी बाँहें

अपनी वस्तु सबको प्रसंशा योग्य एवं अच्छी मालूम होती है, अपनों की सब बड़ाई करते हैं

मेरे पूत की लम्बी लम्बी बाहें

अपनी वस्तु का बहुत महत्व होता है

मेरी बिल्ली और मुझी को म्याऊँ

रुक : मेरी बिल्ली और मुझ ही से मियाऊं जो फ़सीह है

मेरी बिल्ली और मुझी से म्याऊँ

मेरा आज्ञाकारी और मुझ ही से लड़े (अधिकतर हमारी बिल्ली और हम से म्याऊं करती है)

मेरी दोनों मामीं

वह व्यक्ति जो किसी काम में किसी पर बाज़ी ले गया हो

मेरी एक बोली दो बोली मेरी नकटी सटासट बोली

एक लड़ाकू स्त्री का दूसरी से कहना कि मैंने तो एक गाली दी दो गालियाँ दीं लेकिन यह नकटी तो बराबर गाली दिए जा रही है

मेरी मुर्ग़ी की तीन टाँग

अपनी चीज़ की बेजा तारीफ़

मेव मरा तब जानिये जब वा का तीजा हो

मेव अर्थात जाट बहुत हठ-जीव होते हैं ऐसी बातें प्राय: एक जाति दूसरी जातियों के प्रति कहती है

मिघा के बरसे, मय्या के पुर्से

बारिश से ज़मीन और माँ के खिलाने से औलाद आसूदा होती है

मी चकद आँचे दर आव नह-ए-मन अस्त

जो कुछ मेरे बर्तन में है वही उससे टपकता है, जैसा मेरा स्वभाव है, वैसे ही कार्य मुझसे होते हैं

मीर ख़ाँ के ऊँटों में रोक है

इस ख़ानदान के सब अफ़राद ख़राब हैं

मीरां की बोटी है

बड़ा हिस्सा तो बड़े आदमी को ही मिलेगा

मीरान गोर बराबर

जिस क़दर मीराँ की क़ब्र खोदी गई उतनी ही मिट्टी ऊपर पड़ गई, मीराँ की क़ब्र उतनी ही लंबी है जितने ख़ुद मीराँ: मुराद: किसी चीज़ का अदम और वजूद बराबर होना, आमदनी और ख़र्च का बराबर होना

मीरास पिदर ख़्वाही 'इल्म पिदर आमोज़

(फ़ारसी कहावत उर्दू में मुस्तामल) बेटे को बाप का इलम हासिल करना चाहिए, बाप का क़ाइम मक़ाम होने के लिए बाप के से तौर तरीक़ सीखना लाज़िम हैं

मीरास पिदर ख़्वाही 'इल्म पिदर आमोज़

रुक: मीरास पिदर ख़्वाही इलम पिदर आमोज़, बेटे को बाप का इलम सीखना चाहिए

मीत बनाए न बने बैरी सिंह और नाग, जैसे कधे न हो सकें ऐक ठौर जल आग

दुश्मन शेर और साँप दोस्त नहीं बन सकते जिस प्रकार पानी और आग इकट्ठे नहीं हो सकते

मीठा और भर कटोरी

अधिक लोभ के अवसर पर रोकने के लिए कहते हैं

मीठे के लालच झूटा खाते हैं

रुक : मीठे की तुम्ह से अलख

मीठे की लालच झूटा खाते हैं

रुक : मीठे की तुम्ह अलख

मीठे से मरे तो ज़हर क्यों दे

अगर मीठी-मीठी बातों से काम निकाला जा सकता है तो ज़बरदस्ती नहीं करनी चाहिए

मीठी बातों में दिन रात कटते मा'लूम नहीं देते

अच्छी बातों या ख़ुशहाली में समय जल्द बीत जाता है

मीठी छुरी, ज़हर की पुड़ी

बातें कोमल एवं सुखद परंतु अंदर में कठोर एवं शत्रु

मिल गए की हर गंगा

इत्तिफ़ाक़ीया मुलाक़ात और साहिब सलामत के मौक़ा पर मुस्तामल

मिल गई तो रोज़ी वर्ना रोज़ा

अगर मज़दूरी या काम से पारिश्रमिक मिल गया तो गुज़ारा हो जाएगा वर्ना भूखा रहना पड़ेगा

मिलन हीरे की सी दिल में फाँकें खीरे की सी

बाहर से दोस्त है अंदर से दुश्मन

मिल-जुल करते रहिए काज जीते हारे न आवे लाज

सब के सलाह और मश्वरे की बात में कोई इल्ज़ाम नहीं दे सकता

मिल्की क्या जाने पराए दिल की

धनवानों को क्या मा'लूम कि ग़रीबों की गुज़र कैसे होती है

मिल्की न कहे दिल की

ज़मींदार अपना भेद किसी को नहीं देता

मिल्की न कहे दिल की, पलटें दरवाज़े निकलें खिड़की

अमीर आदमी किसी पर अपने दिल का भेद प्रकट नहीं करता

मिलने से कोई मिलता है

आपस में मिलने से एकता हो जाती है, जो कोई किसी से मिलता है तो दूसरा भी उससे मिलता है

मिम्बर बनाए , मस्जिद ढाए

छोटी छोटी बातों में दीनदारी और ज़रूरी उमूर में इस के ख़िलाफ़ तर्ज़ अमल

मिंबर को बनाए मस्जिद को ढाए

چھوٹی باتوں سے پرہیز اور بڑی ممنوعہ باتوں پر دلیر

मिम्बर को बनाना , मस्जिद को ढाना

थोड़े फ़ायदे के लिए ज़्यादा नुक़्सान करना । छोटी छोटी बातों के आगे बड़ी बड़ी बातों को भूल जाना

मिर्ग बंदर तीतर ये चारों खेत के चोर

हिरन, बंदर, तीतर और चोर खेती को नुक़्सान पहुँचाते हैं

मिस्सी काजल किस को, मियाँ चले भुस को

निर्धन की हालत पर कहते हैं कि मिस्सी काजल किस पर लगाऊँ मियाँ तो जा रहे हैं भुस भरने

मिट्टी का घड़ा भी ठोंक बजा कर लेते हैं

साधारण वस्तु की भी देख-भाल कर लेनी चाहिए

मिट्टी में हाथ डाले तो सोना हो जाए

बहुत भाग्यशाली है, जो काम करता है उस से बहुत लाभ होता है या बहुत पैसा कमाता है, भाग्यशाली को हर काम में लाभ होता है

मिट्टी मिट्टी है, सोना सोना है

सस्ती चीज़ अपनी जगह सस्ती है और क़ीमती चीज़ क़ीमती चीज़ ही है

मिटती नहीं करम की रेखा

क़िस्मत में लिखी बात हो कर रहती है, मुक़द्दर का लिखा अटल है

मिट्टी पर हाथ डालता है सोना मिलता है, मिट्टी पकड़ने से सोना होता है

इतना भाग्यशाली है कि जिस काम में हाथ डाले उसमें से रुपया कमाता है

मियाँ बाहर पंज हज़ारी , बीवी घर में क़हत की मारी

(अविर) मियां बाहर ऐश कररहे हैं बीवी घर में मुसीबत झील रही है , रुक : बाहर मियां हफ़तहज़ारी, घर में बीवी फ़ाक़ों मारी जो ज़्यादा मुस्तामल है

मियाँ बीवी दो जने , किस के लिये पीसें जौ चने

घर के दो आदमी हूँ तो ख़िस्त (या ज़्यादा मेहनत) करना बेफ़ाइदा है

मियाँ बिवी दो जने ,किस लिये जौ चने

इस मौके़ पर कहा करते हैं जब किसी के लड़के लड़की ना हो और फिर वो ख़िस्त करे यानी जब सिर्फ़ मियां बीवी ही खाने वाले हैं और ख़र्च ज़्यादा नहीं है तो फिर ख़िस्त करना और जमा करके मरना बेकार है

मियाँ बीवी राज़ी क्या करेगा क़ाज़ी

जब आपस में एकता हो तो दूसरा किस प्रकार अच्छी एवं बुद्धि की बातों में हस्तक्षेप कर सकता है

मियाँ गए रवंद , बीवी गईं पट रवंद

ख़ावंद घर से बाहर जाएं तो बीवी भी चल देती है इस औरत के मुताल्लिक़ कहते हैं जो बहुत फुर्ती रहे

मियाँ घर नहीं, बीवी को डर नहीं

ख़ावंद घर मौजूद ना हो और बीवी खुल खेले तो कहा जाता है

मियाँ ही की जूती, मियाँ ही का सर

रुक : मियां का जूता हो और मियां ही का सर

मियाँ जिस को चाहे वही सोहागन

रुक : जिसे पिया चाहे वही सुहागन जो फ़सीह है

मियाँ का दम और किवाड़ की जोड़ी

किसी ऐसे भले आदमी की बात जिसके पास कुछ नहीं और जो किसी बात की चिंता भी नहीं करता

मियाँ का जूता हो और मियाँ ही का सर

अपने ही हाथों लाचार होना, किसी की बेइज़्ज़ती इस के अपने ही कारिंदों के हाथों कराना

मियाँ कमाऊ बीबी उड़ाऊ

एक कमाए दूसरा ख़र्च करे

मियाँ कमाते क्या हो एक से दस, सास नंद को छोड़ दो, हमें तुम्हें बस

जहाँ स्त्री पति को लेकर अलग घर करना चाहे तो कहते हैं

मियाँ के मियाँ गए, बुरे बुरे सपने आए

उस स्त्री का कथन जिसके पति का देहांत हो गया है या शायद विदेश चला गया है अर्थात एक के बा'द दूसरी मुसीबत

मियाँ की चुल्हिया कहीं, बीवी की हंडकुल्हिया कहीं

(ओ) बाहमी नाचाक़ी या बे इलतिफ़ाती ''ऐसे रूखे फीके रहते हैं जैसे कभी मेल ही ना था वही मिसल हुई कि मियां की चलहया कहीं बीवी की हिंड कुल्हिया कहीं '

मियाँ की दाढ़ी वाह वाह में गई

झूठी प्रशंसा के लोभ में जब कोई अपनी सब संपत्ति उड़ा दे तब कहते हैं

मियाँ की जूती मियाँ का सर

किसी को मूर्ख बनाकर जब उसका पैसा खाया जाए प्रायः तब कहते हैं

मियाँ मेरा घर नहीं , मुझे किसी का डर नहीं

रुक : मियां घर नहीं बीवी को डर नहीं, जो चाहे करूं जो चाहे ना करूं (औरतों में मुस्तामल)

मियां नाक काटने को फिरें, बीवी कहे मुझे नथ घड़ा दो

एक कुछ कहे दूसरा कुछ, एक का कुछ मतलब हो दूसरा कुछ समझे

मियाँ ने टोई, सब काम से खोई

मालिक यदि लौंडी से भोग-विलास करे तो वो काम नहीं करती

मियाँ फिरे लाल-गलाल बीवी के रहें बुरे अहवाल

पति बाहर भोग विलास कर रहा है, पत्नी घर में कष्ट झेल रही है

मियाँ-बीवी की लड़ाई दूध की मलाई

मियाँ बीवी का झगड़ा थोड़ी देर के लिए होता है, आज लड़ाई तो कल मेल

मियाँ-बीवी की लड़ाई जैसे सावन-भादों की झड़ेक

मियाँ बीवी का झगड़ा थोड़ी देर के लिए होता है, आज लड़ाई तो कल मेल

मियाऊँ को कौन पकड़े गा

बलशाली की आवाज़ से ही डर लगता है

मियान में से निकले ही पड़े है

बहुत उग्र स्वभाव है, बहुत तेज़ मिज़ाज है, बात बात पर लड़ता है

मियो का पूत बारा बरस में बदला लेता है

मेव लोग इंतिक़ाम लेकर रहते हैं, ख़ाह देर में ही

मियों का घर बुरा

कोई तदबीर कारगर नहीं होती

मिज़ाज क्या है इक तमाशा है, घड़ी में तोला घड़ी में माशा है

दम दम अपना प्राकृतिक स्वभाव बदलने वाला है, घड़ी में ख़ुश घड़ी में क्रोधित

मिज़ाज-ए-'आली, न तो शक न निहाली

जब कोई शख़्स मुफ़लिसी-ओ-तही दस्ती में नाज़ुक मिज़ाजी दिखाता है तो इस की निसबत तंज़न बोलते हैं मिज़ाज तो अमीराना रखते हैं मगर बिछा ने के लिए तोशक या नहा लुच्चा तक मयस्सर नहीं, ग़रीबी में अमीराना मिज़ाज रखने वाले पर तंज़न बोला जाता है

मो को न तो को, ले भाड़ में झोको

ना ख़ुद अपने काम में য৒ब लाएंगेगे ना तुम्हें काम में लाने देंगे चाहे ज़ाए हो जाये तो हो जाये

मोची को 'अर्श पर भी बेगार ही नसीब होती है

किसी नीच आदमी ऊँची जगह पर पहुँच जाए तब भी वह अपनी औक़ात पर ही रहता है, नीच अपनी आदत नहीं छोड़ता

मोची लड़ें और सरकार का ज़ीन टूटे

लड़े कोई और नुक़्सान किसी का हो, बड़े लड़ें और नुक़्सान छोटों का हो, करे कोई भरे कोई

मोहब्बत दिल्लगी नहीं

इशक़ आसान काम नहीं

मोहब्बत के मारे सदा गोर किनारे

प्रेमी सदैव पीड़ा में रहता है

मोहब्बत के मारे सवा गोर किनारे

आशिक़ हमेशा तकलीफ़ में रहते हैं

मोहे और न तुझे ठोर

तेरे बिन मुझे और मेरे बिन तुझे कल नहीं, ना तो मुझ ही को दूसरा मिलता है और ना तुझ को ही दूसरा ठिकाना है

मोहे गिन , मोहे गिन , तुझे कौन गिने

कोई पूछे या ना पूछे मगर आप दख़ल दिए जाना, ख़्वाहमख़्वाह किसी बात या काम में पांव उड़ाना, दख़ल दर माक़ूलात

मोम हो तो पिघले, कहीं पत्थर भी पिघला है

कंजूस और कठोर आदमी के लिए व्यंग्य में कहते हैं

मोम की मरयम काठ के पाए, उठ री मरयम तिरे धगड़े आए

अपने में बूता नहीं दूसरों पर भरोसा करना और डींग हांकने वाले के संबंध में कहते हैं

मोम की नाक बछिया का बावा

मुराद : बेवक़ूफ़ और कच्चे कानों का

मोम की नाक जिधर चाहो मोड़ लो

रुक : मोम की नाक जिधर चाहो फेर लो

मोम की नाक जिधर चाहो फेर दो

दुर्बल व्यक्ति से जो चाहो काम ले लो, दुर्बल व्यक्ति से जो चाहो कहलवा लो

मोमिन एक सूराख़ से दो मर्तबा नहीं डसा जा सकता

(हदीस) सच्चा मुस्लमान बार बार धोका नहीं खा सकता

मोरचगाँ रा चू बुवद इत्तिफ़ाक़ शेर-ए-ज़ियाँ रा बदर आरंद पोस्त

(फ़ारसी कहावत उर्दू में प्रयुक्त) चींटियाँ अगर यकमत हो जाएँ तो ख़ूख़ार शेर की खाल उतार लेती हैं, बहुत से निर्बल एकमत होकर बलवान को भी प्रास्त कर सकते हैं, आपस के एकमत्ता से काम बनता है

मोरे बाप के अंचल कपास, मोरे लेखे पड़ल तुसार

ग़रीब घर में ब्याही गई लड़की का कहना कि मेरे बाप के यहाँ तो मनों कपास उपजता है और मेरे भाग्य में ठंड भोगना बदा है

मोर-ए-ज़'ईफ़ और सुलैमाँ का सामना

कमज़ोर का ज़बरदस्त से सामना हो तो कहते हैं

मोरी की ईंट चौबारे चढ़ी

अपमानित एवं कमीने व्यक्ति को सम्मान प्राप्त हो जाए तो उसके प्रति कहते हैं

मोरी की ईंट महल में नहीं लग सकती

कमीने को आला दर्जा नहीं मिल सकता

मोरी में पत्थर डालोगे तो छींटें उड़ेंगी

गंदे मुआमले में पड़ोगे तो बदनामी होगी

मोटा आदमी घटे न दुबलाए, दुबले का तो काम तमाम हो जाए

ज़बरदस्त बड़ा दुख सहन कर सकता है, थोड़ा सा दर्द भी कमज़ोर को विनम्र बना देता है, ग़रीब को हर बात में कठिनाई है

मोटा इतने दुबला हो दुबले का काम तमाम हो

थोड़ा सा झटका भी ताक़तवर की तुलना में कमज़ेरों के लिए अधिक है, ग़रीब को हर बात में मुश्किल है

मोज़ा का घाव बीवी जाने या पाँव

रुक : मौज़े का घाओ अलख, अपनी तकलीफ़ को इंसान ख़ुद अच्छी तरह समझता है

मुए बैल की बड़ी बड़ी आँखें

मरे हुए संबंधी की हद से अधिक प्रशंसा करने या किसी चीज़ या घटना के बीत जाने के पश्चात उस की प्रशंसा करने के अवसर पर प्रयुक्त

मुई क्यूँ कि साँस न आया

यह अच्छा काम अपनी इच्छा या ख़्वाहिश से नहीं बल्कि मजबूरी में किया

मुंडा जोगी और पिसी दवा पहचाने नहीं जाते

सर मुंडे हुए जोगी के रंग-रूप से प्रतीत नहीं होता कि उस का बातिन अर्थात भीतर कैसा है जैसे कि पिसी हुई दवा को देख कर पता नहीं चलता कि क्या चीज़ है

मुँह चले सत्तर बला टले

सारी ताक़त खाने पीने से होती है

मुँह छोटा और बात बड़ी

हौसले और हैसियत, रुतबे या दस्तरस वग़ैरा से बढ़ कर दावा, शेखी या कोई और बात , अपनी आजिज़ी-ओ-इनकिसारी ज़ाहिर करने के मौक़ा पर मुस्तामल

मुँह छोटा बात बड़ी

औक़ात से बढ़ कर बात करना, जब कोई कमीना आदमी घमंड और ग़ुरूर वग़ैरा की बात करता है तो कहते हैं

मुँह चिकना पेट ख़ाली

ऊपर से सुसज्जित अंदर फटे-हाल, केवल शेख़ी ही शेख़ी

मुँह दर मुँह ख़ाला नानी , पीठ पीछे दुश्मन जानी

ज़ाहिर में ख़ुशामद और बातिन में अदावत रखने वाले के लिए मुस्तामल

मुँह देख के बीड़ा, चूतड़ देख के पीढ़ा

हर एक के साथ सभ्यता से पेश आना चाहिए

मुँह देख के थप्पड़ लगाया जाता है

हर व्यक्ति की हैसियत देख कर उस से वैसा ही व्यवहार किया जाता है

मुँह देखी सब कहते हैं, ख़ुदा लगती कोई नहीं कहता

सब चापलूसी और तरफ़दारी की बात करते हैं सच्च और इंसाफ़ की कोई नहीं कहता

मुँह धोवे, रोज़े खोवे

रिंदों, बे नमाज़ों का मक़ूला है

मुँह गैल तमाँचे हैं

जैसा आदमी होता है वैसा ही उसे मिलता है

मुँह हाले और सत्तर बला टाले

शक्तिशाली के सब दुश्मन पस्त रहते हैं, भोजन मिलता रहे तो बीमारी दूर रहती है, एक मुँह चले और सत्तर रोग टले

मुँह ही मुँह मारे और तौबा-तौबा पुकारे

ख़ुद ही सज़ा दे खुद ही शरण माँगे, अपना आरोप मासूम के सिर थोपे

मुँह का निवाला तो नहीं है

जो जल्दी निगल लिया जाए अर्थात अपने हाथ का काम नहीं है

मुँह काला जात उजाला

शरीफ़ों के बुरे कर्म

मुँह के आगे ख़ंदक़ नहीं

बहुत बकबक करता है, बोलने लगे तो रुकता ही नहीं, बड़ा बिकी है, ज़बान रुकती नहीं

मुँह के चार मुँह

चेहरे पर इतने ज़ख़म लगे कि वो टुकड़े टुकड़े हो गया

मुँह खाए आँख लजाए

जिस का खाए उस का एहसानमंद होना ही पड़ता है

मुँह की माँगी मौत नहीं मिलती

रुक : मुँह मांगी मौत नहीं मिलती

मुँह की मीठी पेट की खोटी

बाहर से दोस्त, अंदर से दुश्मन, पाखंडी है

मुँह की मीठी, हाथ की झूटी

मीठी बातें तो करती मगर देती दिलाती कुछ नहीं

मुँह की उतरी लोई, तो क्या करेगा कोई

जब कोई जानबूझ कर निर्लज्जता अपनाए तो कहते हैं

मुँह की उतरी लोई, तो क्या करेगा कोई

कोई जानबूझ कर निर्लज्जता दिखाए तो कहते हैं

मुँह कोइला सा काला , नाम बी गुलाब

ग़ैर मौज़ूं नाम, नाम अच्छा सिफ़ात बरी

मुँह लगाई डोमनी बाल बच्चों समेत आई

रुक : मुँह लगाई डोमनी गावी / नाचे, तालिबे ताल

मुँह लगाई डोमनी कुंबा साथ लाई

इस वक़्त कहते हैं जब कोई ज़रा सा बेतकल्लुफ़ करने पर सर पर चढ़ जाये

मुँह लगी और फ़े'ल मेरे पेट में

रुक : मुँह लगनी दो गुण पेट में

मुँह लगनी दोगन पेट में

ज़रा सी पी और बुरे काम करने लगे, ज़रा सी बात का बहुत बुरा असर होता है

मुँह माँगे मौत नहीं मिलती

हर काम हसब-ए-ख़वाहिश नहीं होता, किसी काम के ना होने का रंज होने पर कहते हैं

मुँह माँगी मौत मिलती है , मुराद नहीं मिलती

आजिज़ी के वक़्त औरतें अपने लिए बददुआ के तौर पर कहती हैं

मुँह माँगी मौत नहीं मिलती

इच्छाएँ पूरी नहीं हुआ करतीं, इच्छानुसार कार्य न होने पर दुःख के अवसर पर उपयोग किया जाना

मुँह माँगी मौत तो मिलती ही नहीं

किसी चीज़ की क़ीमत चुकाते वक़्त बेचने वाले के ज़िद पर ख़रीदार कहता है

मुँह माँगी मुराद किसी को नहीं मिलती

अपना चाहा नहीं होता ईश्वर का चाहा होता है

मुँह माँगी मुराद मिले

फ़क़ीरों की दुआ, इच्छा अनुसार काम हो जाए

मुँह माँगी मुराद नहीं मिलती

अपना चाहा नहीं होता, ख़ुदा का चाहा होता है

मुँह में दाँत न पेट में आँत

दीर्घायु होना, अतियंत बुढ़ापे की हद पर होना

मुँह में कै दाँत हैं

क्या ताक़त है, क्या कर सकते हो

मुँह में रोटी सर पर जूती

निर्लज्जता के साथ जीवन यापन होता है, बड़ी बेशर्मी के साथ रोटी मिलती है, अपमान और बदनामी से गुज़र होना

मुँह में साबून घुला हुआ है

मुँह फीका और बदमज़ा है

मुँह में ज़बान हलाल है

मुँह में जीभ सच बोलने के लिए है, अगर (झूठ की तरह) हराम होती तो मुँह में नहीं रहती, सच कहो, न्याय से बात कहो

मुँह मोतियों से भरा जा सकता है , सो मुँह ख़ाक से भी नहीं भरे जाते

थोड़ा सा ख़र्च मज़ा यक्का नहीं बहुत सा कहाँ से आए

मुँह न तोह नाम चाँद ख़ाँ

جس صفت میں مشہور ہے اس کے خلاف صف سے متصف ہے، (کسی میں) شہرت کے مطابق صفت نہیں پائی جاتی بلکہ اس سے متضاد صفت پائی جاتی ہے

मुँह निकली कोठों चढ़ी

रुक : मुँह से निकली पराई हुई

मुँह नूर न पेट सबूर

न तो हैसियत और न सब्र, ग़रीब हैं और सब्र भी नहीं

मुँह पड़ी और हुई पराई बात

बात मुँह से निकल जाए तो पराई हो जाती है यानी क़ाबू से बाहर होजाती है

मुँह पर आई हुई नहीं रुकती है

जो बात ख़याल में आए वह इंसान कह ही देता है

मुँह पर आई तो नहीं रुकती

कल्पना में आई हुई या सच्ची बात इंसान कह ही देता है

मुँह पर भाई, दिल में क़साई

सामने कुछ, पीठ पीछे कुछ, ज़बान पर भलाई की बातें लेकिन दिल में बुराई, मुनाफ़क़त के इज़हार के लिए मुस्तामल

मुँह पर डाली लोई, तो क्या करेगा कोई

यदि व्यक्ति ढीठ या बेशर्म हो जाए, तो उसे किसी की चिंता नहीं होती

मुँह पर ख़ाला नानी, पीछे दुशमन जानी

चापलूस और धूर्त आदमी के बारे में कहते हैं

मुँह पर कुछ , दिल में ख़ाक नहीं

महिज़ ज़ाहिरदारी है, ज़बानी बातें बनाते हैं

मुँह पर पूत पीछे हरामी मूत

सामने प्रशंसा, सामने तारीफ़, अनुपस्थिति में चुग़ली

मुँह पर पूत, पीछे हरामी मूत

सामने तारीफ़, ग़ैर हाज़िरी में बदगोई

मुँह पर राम-राम और बग़ल में छुरी

कहता कुछ है करता कुछ है मुनाफ़िक़ों की निसबत कहते हैं

मुँह फेर कर घर देख कर

घर उस तरफ है, तुरंत चले जाओ

मुँह रहते नाक से पानी पिएँ

फ़ुज़ूल और उल्टी बातें करते हैं, किसी चीज़ का ग़लत इस्तिमाल या उल्टी बात करने के मौक़ा पर मुस्तामल

मुँह से बात निकली हवा में फिरी

बात कहने के बाद प्रसिद्ध हो जाती है

मुँह से बोलो सर से खेलो

बातचीत करो, शांत न रहो

मुँह से दूध की बू आती है

अर्थात अभी तुम्हारा बचपन दूर नहीं हुआ

मुँह से दूध टपकता है

नादान और अनुभवहीन है

मुँह से कहना आसान है करना मुश्किल है

कुछ कहना आसान है लेकिन अमल करके दिखाना मुश्किल है

मुँह से निकली कोठों चढ़ी

रुक : मुँह से निकली पराई हुई

मुँह से निकली पराई हुई

जो बात ज़बान से व्यक्त हो जाए वह राज़ नहीं रहती, राज़ मुँह से निकलते ही प्रसिद्ध हो जाता है

मुँह सूई, पेट कूई

छोटा मुँह और बड़ा पेट, शरी छोटा हो परंतु ख़ुराक बहुत हो तो कहते हैं, आमदनी कम और ख़र्च ज़्यादा

मुद्द'ई मुद्द'आ 'अलैह नाव में, शाहिद तैरते जाएँ

अपने पक्षधर की क़दर न करने के अवसर पर बोलते हैं

मुद्द'ई सुस्त गवाह चुस्त

जिसका असली काम है वह तो लापरवाही करे और दूसरे आवश्यकता से अधिक दिलचस्पी दिखाएं तब कहते हैं

मुफ़्लिस और फ़ाल्से का शर्बत

रुक : मुफ़लिस और हॉट की सैर

मुफ़्लिस और हाट की सैर

ग़रीब का फुज़ूलखर्ची करना, लँगोटी में फाग खेलना, मुफ़लिसी में अमीरों की सी आदतें

मुफ़्लिस हमेशा ख़्वार

निर्धन व्यक्ति सदैव अपमानित होता है

मुफ़्लिस का चराग़ रौशन नहीं होता

ग़रीब के पास चिराग़ जलाने के लिए भी कुछ नहीं होता, ग़रीब हमेशा तकलीफ़ में रहता है

मुफ़्लिस की जवानी और जाड़ों की चाँदी किस ने देखी

जाड़े की चांदनी से लुतफ़ नहीं उठाया जा सकता, बेफ़ाइदा चीज़ जिस से लुतफ़ ना उठा या जा सके तो ये कहावत कहते हैं

मुफ़्लिस की जोरू सब की भाबी

ग़रीब की चीज़ को हर कोई हथियाने की कोशिश करता है, ग़रीब की चीज़ पर हर कोई दावा करना शुरू कर देता है

मुफ़्लिस की जोरू सदा नंगी

निर्धन हमेशा तकलीफ़ में रहता है, ग़रीब के पास कुछ नहीं होता

मुफ़्लिस से सवाल हराम हे

निर्धन अथवा मजबूर को किसी तरह का दुख देना ठीक नहीं

मुफ़्लिस तू ख़ुश कि ज़र न दारी

(फ़ारसी कहावत उर्दू में मुस्तामल) ए मुफ़लिस तू ही अच्छा है कि दौलत नहीं रखता, यानी दौलत के झगड़ों से तुझे नजात है

मुफ़्लिसी और फ़ाल्से का शर्बत

ग़रीब का फुज़ूलखर्ची करना, लँगोटी में फाग, मुफ़लिसी में अमीरों की सी आदतें

मुफ़्लिसी और हाट की सैर

ग़रीब का फुज़ूलख़र्ची करना, लँगोटी में फाक

मुफ़्लिसी में आटा गीला

ग़रीबी में अधिक ख़र्च होना, निर्धनता की स्थिति में ऐसे ख़र्चे पेश आना जिससे छुटकारा कठिन हो

मुफ़्लिसी में खोटा पैसा काम आता है

ज़रूरत पर वो चीज़ भी काम आती है जिसे आदमी नाचीज़ समझ कर फेंक देता है, यगाना कैसा ही बुरा क्यों ना हो आड़े वक़्त में ज़रूर मदद है।

मुफ़्लिसी सब बहार खोती है, मर्द का ए'तिबार खोती है

ग़रीबी में जीवन का कोई मज़ा नहीं आदमी अविश्वस्त हो जाता है

मुफ़्त का चंदन घिसे जा बलल्ली

दूसरे की वस्तु का दुरुपयोग करने पर भी कहते हैं

मुफ़्त का दर्द-ए-सर अपने सर लिया है

यानी दूसरे की ज़हमत ख़ुद ओढ़ ली है

मुफ़्त का करना और दूर ले जाना

एक तो बेगार दूसरे दूर की

मुफ़्त का खाएँ, गीत गाएँ

मुफ़्त की खाईं, बे फ़िक़्रों और मुफ़्त ख़ोरों की निसबत कहते हैं

मुफ़्त का माल किस को बुरा लगता है

मुफ़्त का माल हर किसी को अच्छा लगता है

मुफ़्त का माल क़ाज़ी को भी हलाल

कोई चीज़ बिना परिश्रम या मुल्य मिले तो बड़े-बड़े धर्मात्मा और तपस्वी भी उचित एवं अनुचित की परवाह किए बिना ले लेते हैं

मुफ़्त का शिकार है

आसानी से हासिल होने वाली चीज़ के बारे में कहते हैं

मुफ़्त के चड़वा भर भर फेंके

जो चीज़ मुफ़्त मिले उसे इंसान बेदर्दी से ख़र्च करता है

मुफ़्त के खाने वाले हम और हमारा भाई

वहां कहते हैं जहां कोई बेशरमी से लोगों का माल खाए

मुफ़्त के क़िस्से मोल लेना

बिलावजह किसी काम का ज़िम्मा लेना

मुफ़्त की दा'वत में फ़क़त रोटी ही गोश्त है

मुफ़्त की साधारण वस्तु भी अच्छी होती है

मुफ़्त की गंगा इन'आम के ग़ोते

मुफ़्त का माल जितना चाहो ख़र्च करो

मुफ़्त की मारी क़ाज़ी को भी हलाल है

रुक : मुफ़्त की शराब क़ाज़ी को भी हलाल

मुफ़्त की शराब क़ाज़ी को भी हलाल है

मुफ़्त की चीज़ लेने में कोई भी उचित अनुचित का ख़्याल नहीं करता

मुफ़्त की ठाएं ठाएं

बे कार झगड़ा, बेफ़ाइदा झगड़ा

मुफ़्त में निकले काम तो काहे को दीजिए दाम

मुफ़्त में काम कराने वालों को कहा जाता है

मुफ़्त रा, चा गुफ़्त

(उर्दू में मुस्तामल फ़ारसी कहावत) जो चीज़ बे मेहनत या बे क़ीमत मिले इस के लेने में क्या उज़्र हो सकता है, जो चीज़ मुफ़्त मिले इस में क्या कलाम

मुफ़्त-करम-दाश्तन

(फ़ारसी कहावत उर्दू में मुस्तामल) कोई काम अपनी ग़रज़ से करने और दूसरे पर इस की ग़रज़ ज़ाहिर कर के एहसान जताने के मौक़ा पर मुस्तामल यानी ख़्वाहमख़्वाह एहसान जताना

मुग़ल बे-मुग़ल तेरे सर पर कोल्हो

बेतुकी बात कहने वाले के जवाब में प्रयुक्त, उदाहरणस्वरूपः किसी मुसलमान ने एक हिंदू जाट से जो खाट लिए जाता था कहा जाट रे जाट तेरे सर पर खाट, वह मुसलमान एक दिन कोल्हू सर पर रखे लिए जाता था, जाट ने कहा ''मुग़ल रे मुग़ल तेरे सर पर कोल्हू'' मुग़ल ने कहा ''यार तुक

मुग़ल का पूत घड़ी में औलिया घड़ी में भूत

रुक : पठान का पोत घड़ी में औलिया और घड़ी में भूत जो ज़्यादा मुस्तामल है

मुज को पाता है तो तल्वार नहीं पाता

(छुरी को नहीं पाता ज़्यादा बोलते हैं) दुश्मन जान है क्या करे कि बस नहीं चलता

मुजर्रद सबसे आ'ला जिसके लड़का न बाला

बिना ब्याह का आदमी सब से अच्छा उसे किसी बात की चिंता नहीं होती

मुझ को चाहते हो तो मेरे कुत्ते को भी चाहो

अगर मुझ से मुहब्बत है तो मेरी ज़रीत से भी मुहब्बत रखनी होगी

मुझ को कोई न मारे तो सारे जहाँ को मार आऊँ

कायर व्यक्ति ख़तरे से डरता है

मुझ को पाता है तो तलवार को नहीं पाता

जान का दुश्मन है , क्या करे कुछ बस नहीं चलता यानी जब तक ख़ुदा ना चाहे कोई किसी को नुक़्सान नहीं पहुंचा सकता

मुझे और तुझे ठौर

न मुझे बर्दाश्त न तुझे दोनों को यकजाई

मुझे बुढ़िया न कहो कोई , मैं ने जवानों की भी 'अक़्ल खोई

चालाक ज़ईफ़ अपने मुताल्लिक़ कहता है कि वो जवानों को उंगलीयों पहुंचा सकता है , ज़ईफ़ चालाक औरत का क़ौल है कि में बढ़िया हूँ तो क्या हवा में नौजवानों को भी फ़रेफ़्ता करलेती हूँ , बुज़ुर्गों की बनिसबत जवान नापुख़्ता कार होते हैं, जवान बुज़ुर्गों से इलम-ओ-शऊर हासिल करते हैं

मुझे दे सूप तू हाथों फूँक

स्वार्थी व्यक्ति के संबंध में कहते हैं कि उसे अपने काम से काम होता है दूसरे की पीड़ा एवं तकलीफ़ की परवाह नहीं होती

मुझे ओर न तुझे ठोर

मुझे तेरे बिना और तुझे मेरे बिना चैन नहीं

मुझे तो भैरवीं भावे

ख़्वाहमख़्वाह वाक़फ़ीयत जताना, ख़्वाहमख़्वाह इलम जताना

मुझी दे सोप तो हाथों फूँक

ख़ुदग़रज़ आदमी के मुताल्लिक़ कहते हैं कि उसे अपने काम से काम होता है दूसरे की तकलीफ़ की पर्वा नहीं होती

मुख पर राम राम , पेट में छुरी

ज़ाहिर कुछ, बातिन कुछ, ज़ाहिर में नेक, बातिन में ज़ालिम, मक्कार, अय्यार

मुखड़ा तलवों को न पहुँचे

एक शख़्स इस क़दर ख़ूबसूरत है कि दूसरे शख़्स के चेहरे का रंग इस के तलवों के रंग का मुक़ाबला नहीं कर सकता (इंसान की रंगत की तारीफ़ में कहते हैं), मुक़ाबलतन एक इंसान का दूसरे इंसान से कमतर होना , मुक़ाबले में बहुत हक़ीर है

मुलाहज़े की जगह मुलाहज़ा किया जाता है

मर वित्त वाले के साथ मर वित्त की जाती है, हर जगह मर वित्त करना ख़राबी का बाइस होता है

मुलाज़िम-ए-नौ, तेज़-रौ

नया नौकर काम में तेज़ी दिखाता है

मुल्क से मिल्क , मिल्क से मुल्क

बहुत से थोड़ा और थोड़े से बहुत हो जाया करता है

मुल्क-ए-ख़ुदा तंग नीस्त, पा-ए-मुरा लंग नीस्त

दुनिया बहुत विस्तरित है और फ़क़ीर चलने फिरने से विवश एवं अक्षम नहीं

मुल्ला जी क्या कहें, आख़ूंद जी पहले ही समझे हुए हैं

बे मेहनत-ओ-मशक़्क़त अपना काम कर लेना

मुल्ला जी क्या कहें, आख़ून जी आगे ही समझे हुए हैं

बे मेहनत-ओ-मशक़्क़त अपना काम कर लेना

मुल्ला की दाढ़ी तबर्रुक में गई

किसी चीज़ के नष्ट होने या व्यर्थ और अनुपयोगी ख़र्च के समय पर कहते हैं

मुल्ला की मारी हलाल

प्रभावशाली और महान लोगों के बुरे कर्मों को भी अच्छा माना जाता है, बड़े आदमियों का बुरा काम भी दुरुस्त और वैध समझा जाता है

मुल्ला की मारी हलाल अल्लाह की मारी हराम

चूह्ड़ों का मक़ूला है जो एतराज़ करते हैं कि मुस्लमानों का भी अजब मज़हब है, जो ख़ुदा मारे वो तो हराम हो गई जो मिला मारे वो हलाल है

मुल्ला न होगा तो क्या मस्जिद में अज़ान न होगी

किसी ख़ास आदमी के न होने से उस से संबंधित काम रुका नहीं रहता

मुल्ला शुदन आसान अस्त , इंसान शुदन मुश्किल

(फ़ारसी कहावत उर्दू में मुस्तामल) मिला होना आसान है इंसान मुश्किल हुय

मुंडे सर पर पानी पड़ा ढल गया

बेशर्म आदमी किसी बात की परवाह नहीं करता

मुंडी गाय सदा कलोर

जिस गाय के सींग ना हूँ वो बछिया मालूम होती है नीज़ सन से उतरी हुई वो औरत जो जवान बने

मुक़द्दर का लिखा नहीं मिटता

भाग्य का लिखा अवश्य हो कर रहता है

मुक़द्दर में जो है मिलता है

जो कुछ क़िस्मत में हो ज़रूर मिलता है, कमी-बेशी नहीं हो सकती

मुक़द्दर में जो कुछ है हो रहेगा

भाग्य में जो लिखा है ज़रूर होगा, टल नहीं सकता

मुक़द्दर से ज़ोर नहीं चलता

तक़दीर में जो कुछ है वो ज़रूर होता है, तक़दीर बदली नहीं जा सकती

मुरब्बे चोर पराए धन पर

पराई दौलत की ख़ातिर जान देना कमाल हमाक़त है,बेगाना माल मारना आसान नहीं

मुर्दा आएगा तकिये पर

आदमी जाएगा कहाँ हर फिर के यहीं आएगा

मुर्दा बिहिश्त में जाए चाहे दोज़ख़ में , हल्वे माँडे से काम

ख़ुदग़रज़ आदमी को अपने मतलब से काम है कोई जीए या मरे

मुर्दा दोज़ख़ में जाए कि बिहिश्त में , अपने हल्वे माँडे से मतलब

ख़ुदग़रज़ को अपने काम से काम है ख़ाह कोई मरे या जीए

मुर्दा दोज़ख़ में जाए या बिहिश्त में , हमें अपने हल्वे माँडे से काम

ख़ुदग़रज़ को अपने मतलब से काम होता है ख़ाह कोई जीए या मरे

मुर्दा पर जैसे सौ मन मिट्टी, वैसे हज़ार मन

जब मुसीबत हद से गुज़र जाये फिर सैंकड़ों मुसीबतें कुछ मालूम नहीं होतीं , मुसीबत ज़िदों को आने वाली मुसीबतों का क्या डर , मुसीबत ख़ाह थोड़ी हो या बहुत मुसीबत ही तो है

मुर्दा-ब-दस्त-ज़िंदा

जब मरने वाला मर गया तो जीवित लोग उसका जो चाहें सो हाल करें वो बेबस होता है

मुर्दा-दर-दस्त-ए-ज़िंदा

रुक : ुमरदा बदसत ज़िंदा

मुर्दन ब 'इज्जत ब अज़ ज़िंदगानी ब ज़िल्लत

इज़्ज़त और सम्मान के साथ मरना अपमानजनक जीवन से बेहतर

मुर्दे की गाँड में लगा दो तो उठ बैठे

लाल मिर्च की तेज़ी और खट्टी चीज़ की भीषणता अथवा प्रभाव आदि ज़ाहिर करने के लिए कहते हैं

मुर्दे की गोर पहचानता हूँ

दूसरे के दाओ फ़रेब को अच्छी तरह समझता हूँ

मुर्दे को बैठ कर रोते हैं, रोज़ी को खड़े हो कर

बेरोज़गारी का दुख सबसे अधिक होता है

मुर्दे पर जैसे सौ मन मिट्टी , वैसे हज़ार मन

जब मुसीबत पड़ी तो जैसी थोड़ी वैसी बहुत

मुर्दों पर कफ़न है और ज़िंदों पर क़बा

तही दस्ती ज़ाहिर करने के लिए मुस्तामल

मुर्ग़ बाँग न देगा तो क्या सुब्ह न होगी

कोई काम किसी की ज़ात इख़ास पर मौक़ूफ़ नहीं, दुनिया का काम वक़्त पर होता रहेगा

मुर्ग़ की बाँग को कौन सुनता है

कम दर्जे के आदमी की तरफ़ कौन तवज्जा करता है

मुर्ग़ की एक टाँग

अपनी बात की हठ, अपने ग़लत या झूटे कथन की हठ (उस वक़्त कहते हैं जब कोई अपनी बेजा बात पर अड़ा हुआ हो)

मुर्ग़ सर बुरीदा बाँग नमी दहद

(फ़ारसी कहावत उर्दू में मुस्तामल) सर कटा मुर्ग़ बाँग नहीं देता, दुश्मन को क़तल करना ही बेहतर है

मुर्ग़ा बाँग न देगा तो क्या सुब्ह न होगी

कोई भी कार्य किसी विशेष व्यक्ति पर आश्रित या टिका, ठहरा या रुका हुआ नहीं है, रहती दुनिया तक काम होते ही रहेंगे

मुर्ग़ा हज़म, बकरी पर दम

छोटी चीज़ लेने के बाद बड़ी चीज़ पर नज़र है

मुर्ग़ा न होगा तो क्या अज़ान न होगी

कोई भी कार्य किसी विशेष व्यक्ति पर आश्रित या टिका, ठहरा या रुका हुआ नहीं है, रहती दुनिया तक काम होते ही रहेंगे

मुर्ग़ा पश्म भेड़ हज़्म

जो भेड़ को पचा सकता है उसके लिए मुर्ग़ा क्या चीज़ है

मुर्ग़े की बाँग का क्या ए'तिबार

बकवासी आदमी की डींग का क्या भरोसा

मुर्ग़े की बाँग को कौन सहीह रखता है

बकवासी की डींग का क्या एतबार या औरत की बात काबिल एव एतिमाद नहीं

मुर्ग़े की एक टाँग

इस मौक़ा पर मुस्तामल जब कोई अपनी ग़लत बात पर उड़ा रहे या हिट धर्मी करे

मुर्ग़ी को तकले का घाओ बहुत है

۔मिसल ग़रीब को थोड़ा नुक़्सान भी बहुत है।कमज़ोर को थोड़ा सदमा भी बहुत है।(मुहसिनात)बढ़िया हरियाली और कोठरी की दीवार में आकर बच गई मगर वही मिसल है मुर्ग़ी को तकले ही का घाओ बहुत होताहै दोतीन दोहतड़ जो इस पर जमे सिसकियां लियेने लगी

मुर्ग़ी के ख़्वाब में दाना ही दाना

मनुष्य हर समय अपने ही मतलब की बात सोचता है

मुर्ग़ी के लिये तकले का ज़ख़्म भी बहुत होता है

रुक : मुर्ग़ी को तकले का घाओ बस अलख

मुर्ग़ी की अज़ान और 'औरत की गवाही का ए'तिबार नहीं

मुर्ग़ी का अज़ान देना प्रकृति के ख़िलाफ़ है और महिला की गवाही मान्य नहीं है

मुर्ग़ी की अज़ान कौन सुनता है

औरत की बात का कोई एतबार नहीं, अगर मुर्ग़ी की बजाय मुर्गे कहा जाए तो बकवासी डींग का क्या भरोसा

मुर्ग़ी की बाँग का क्या ए'तिबार

'औरत की बात का क्या भरोसा, 'औरत की डींग का क्या भरोसा

मुर्ग़ी की बाँग कौन सुनता है

कमज़ोर को कोई नहीं पूछता

मुर्ग़ी की बाँग को कौन सहीह कहता है

स्त्री की बात का कोई भरोसा नहीं

मुर्ग़ी की बाँग रवा नहीं

दुर्बल की बात का महत्व नहीं होता

मुर्ग़ी की एक टाँग

रुक : मुर्ग़ी की एक टांग, वहां बोलते हैं जहां कोई अपनी ग़लत बात पर उड़ा रहे

मुर्ग़ी नौ जगह हलाल नहीं होती

थोड़ी चीज़ में हर शख़्स को अलग अलग हिस्सा नहीं दिया जा सकता

मुर्ग़ी तो जान से गई, खाने वालों को मज़ा न आया

रुक : मुर्ग़ी अपनी जान से गई खाने वालों को मज़ा ना आया

मुर्ग़ों के ख़्वाब में दाना ही दाना

जो आदमी के दिल में होता है वही ख़्वाब में दिखाई देता है, इंसान हर वक़्त अपने मतलब ही की बातें सोचता है, बिल्ली के ख़्वाब में छीचड़े

मुसलमानान दर गोर व मुसलमानी दर किताब

मायूसी के इज़हार के मौके़ पर कहते हैं, मुस्लमान मर चुके और इस्लाम फ़क़त किताबों में है, यानी सही मुस्लमान नहीं रहे

मुसलमानी और आना कानी

अपने लिंग से दूरी बनाने वाले के बारे में बोलते हैं, मुसलमान होने के बावजूद दया से दूरी

मुसलमानी में आना कानी क्या

मुसलमान होते हुए टाल-मटोल कैसा

मुसलमानी-आबादानी

मुसलमान होना आशीर्वाद है

मुश्किले नीस्त कि आसाँ न शवद , मर्द बायद कि हरासाँ न शवद

(फ़ारसी कहावत उर्दू में मुस्तामल) हर मुश्किल आसान हो जाती है, इंसान को चाहिए कि हिरासाँ ना हो, नाउम्मीद ना होना चाहिए , मुसीबत से मुक़ाबला करने के वक़्त कहते हैं

मुश्तरी-होशियार-बाश

इस मौके़ पर कहते हैं जब ख़रीदार सौदा देख भाल कर ना ले और नुक़्सान उठाए

मुश्ते-अज़-नमूना

रुक : मुश्ते नमूना अज़ खरवा रे

मुसीबत कभी तनहा नहीं आती

कहते हैं कि इंसान पर जब कोई बुरा वक़्त आए तो परेशानियाँ और बढ़ जाती हैं

मुस्लिमानाँ-दर-गोर-ओ-मुसलमानी-दर-किताब

मुस्लमान मर गए और इस्लाम किताबों में रह गया, पक्के मुस्लमानों के न होने पर पछतावे के रूप में कहते हैं

मुट्ठी बाँधे आए , हाथ पसारे जाए

जैसे ख़ाली हाथ आए वैसे ही ख़ाली हाथ गए, दुनिया में जैसे आता है वैसे ही ख़ाली हाथ जाता है

मुट्ठी बराबर हड्डियाँ और दा'वे ये

कमज़ोर आदमी हो कर ऐसा दावा करता है

मुट्ठी मुट्ठी अम्बार , ज़र्रा ज़र्रा खंडसार

थोड़ा थोड़ा मिल कर बहुत हो जाता है

मूए बाप की बड़ी बड़ी आँखें

इंसान का मूल्य मृत्यु के बाद होता है

मूए का कोई नहीं, जीते का सब कोई

जीवित की सभी चापलूसी करते हैं, मृत का कोई नाम नहीं लेता, धनी के सभी मित्र होते हैं, निर्धन की मिट्टी अपवित्र है, शक्तिशाली के सभी साथी हैं, कमज़ोर का कोई साथ नहीं देता

मूए की क़ब्र और जीते का घर

मुर्दे को क़ब्र में आराम और ज़िंदा को घर में, हर व्यक्ति अपनी जगह पर ही ठीक ढंग से रहता है, हर व्यक्ति अपनी जगह पर ख़ुश रहता है, हर चीज़ अपनी उचित जगह पर अच्छी लगती है

मूए को मारे शाह मदार

रुक : मरे को मारें शाह मदार जो ज़्यादा मुस्तामल है

मूए पर तीन दिन भारी

कहा जाता है कि मुर्दे की आत्मा पर तीन दिन तकलीफ़ रहती है, मुर्दे से तीन दिन तक उसके कर्मों के बारे में पूछताछ की जाती है

मूई बछिया बामन को दान

बेकार और ख़राब चीज़ जो अपने काम की न हो उसे दूसरे को देदी या भगवान के नाम पर दान दे दिया

मूई माई, टूटी सगाई

जिनकी मित्रता से रिश्ते और संबंध हों, जब वो मर जाएँ तो वह बात नहीं रहती; मामला ख़त्म होने के बाद कुछ मतलब नहीं होता

मूँ पौ मस्जिद दिल में बुत-ख़ाना

ज़ाहिर कुछ बातिन कुछ, बज़ाहिर मुस्लमान दिल में काफ़िर

मूंड मुंडाए तीन गुन, गई टांट की खाज, बाबा हो जग में फिरे पेट भर खाया नाज

सिर मुंडाने के तीन लाभ हैं एक तो सर की खुजली जाती रहती है दूसरे बाबा बन कर संसार का भरमण होता है और पेट भर कर रोटी मिलती है अर्थात साधु बन जाने में मज़ा है

मूँढे भी अपने और हाथ भी अपने

इख़तियार हर तरह से अपने क़ाबू में है जैसा चाहें करें कोई रोक टोक करने वाला नहीं

मूँग मोठ में छोटा बड़ा कौन

बिरादरी में सब समान हैं, अपनों में निर्धन एवं धनवान समान होते हैं

मूँग सूँघनी नार, बकरी खाए चार

बह ज़ाहिर नाज़ुक है मगर खाती बहुत है, जो औरत ज़्यादा खाए इस के मुताल्लिक़ कहते हैं

मूँह में दाँत न पेट में आँत

बहुत बूढ़े की निसबत कहते हैं

मूछ मरोड़ा रोटी तोड़ा

उस व्यक्ति के संबंध में कहते हैं जो मुफ़्त की रोटियाँ खाए काम कुछ न करे और मूछों पर ताव देता फिरे

मूकू न तूकू भाड़ में झोंकू

ना मेरे काम का ना तुम्हारे काम का, ऐसी चीज़ का क्या करना है दूर करो

मूल न वा सूँ भाए करो जो नर करे ग़ुरूर, जो नर साईं से डरे वा से डरो ज़रूर

घमंडी व्यक्ति से बिलकुल न डरो परंतु जो ईश्वर से डरे उससे अवश्य डरो

मूल से ब्याज प्यारा होता है

बेटी से अधिक दामाद प्रिय होता है

मूलेम के चोर को सूली

छोटे जुर्म पर बड़ी सज़ा (जुर्म और सज़ा में अदम तवाज़ुन के मौक़ा पर मुस्तामल)

मूली अपने ही पत्तों भारी

जब अपना ही गुज़ारा मुश्किल से है तो दूसरों को क्या देंगे

मूली के पतवातों पर लोन की डली

उसके मुताल्लिक़ कहते हैं जो अपनी मामूली चीज़ों का ज़िक्र बड़ी गर्व से करे

मूंड दिया माँग खाओ

चेला बना लिया जाओ माँगो और खाओ, साधू चेले को कहता है

मूरक की सारी रैन चतुर की एक घड़ी

रुक : मूर्ख की सारी रैन चतर की एक घड़ी

मूरख के बखान सहावे

नादान को नसीहत सुनने की आदत होजाती है

मूरख के हाथ कमान, बूढ़ा बचे न जवान

नादान मगर ज़ी मक़दूर शख़्स बगै़र सोचे समझे काम करता है

मूरख के समझाए ज्ञान गाँठ जाए

बेवक़ूफ़ को समझाने से इलम-ए-सनाए होता है

मूरख की सारी रैन चतुर की एक घड़ी

मूरख के साथ सारी रात रहने की अपेक्षा चतुर के साथ घड़ी भर रहना अच्छा

मूरख को मत सौंप तू चतुराई का काम, गधा बिकत मिलते नहीं बध घोड़े के दाम

मूर्ख को बुद्धि का काम नहीं सौंपना चाहिए, गधे का मूल्य बड़े घोड़े के बराबर नहीं मिलता

मूरख को समझाना सरस बेच चली जाए, ज्यूँ पत्थर के मारे चोखो तीर नसाए

मूर्ख को उपदेश देने से संपूर्ण अच्छे उद्देश्यों की हानि हो जाती है

मूसा डरा मौत से और आगे मौत खड़ी

मौत से छुटकारा मुम्किन नहीं

मूसल करें जहाँ सींक न समाए

कमाल मुबालग़ा करने के मौक़ा पर मुस्तामल (जहां सोई ना समाय वहां मोसुल घुसेड़ दें)

मूत की धार नहीं सूझती

इंतिहाई नक़ाहत या शदीद तारीकी के बाइस ज़ोफ़ बसारत होने के मौक़ा पर मुस्तामल

मूतेंगे और सो रहेंगे

बेफ़िकर हो जाऐंगे

मूतने का घाव मियाँ जाने या पाँव

हर शख़्स छपी जगह से ख़ुद ही वाक़िफ़ हो सकता है, पोशीदा हाल या राज़ दूसरे क्या जानें

मूज़ी का माल निकले फूट कर खाल

कष्टदायी या अत्याचारी का धन पचता नहीं, अत्याचार से प्राप्त किया हुआ धन किसी व्यक्ति को पच नहीं सकता

मूज़ी का माल सब को हलाल

अत्याचारी या कंजूस का माल जिसके हाथ लग जाए उड़ा लेता है

मुवा घोड़ा भी कहीं घास खाता है

बूढ़ा आदमी अय्याशी करे तो कहते हैं

मुवा साँप गले में पड़ा है

बड़ा दिक़ होना, कुछ तदबीर नहीं चलना, बरी-उल-ज़मा नहीं हो सकना

मुज़दूर ख़ुश दिल कुनद कार-ए-बेश

۔(फ) मक़ूला। काम काम का सिला पाने वाला मेहनत से काम करता है।मज़दूरी मुअन्नस। उजरत। काम का मुआवज़ा।सिला २। मेहनत।मशक्कत

मुझ्दा-बाद ऐ मर्ग 'ईसा आप ही बीमार है

(फ़रसी कहावत उर्दू में प्रचलित है) हे मृत्यु ख़ुश हो कि स्वयं ईसा बीमार है, जिससे मदद की आशा थी वह स्वयं बीमार पड़ा है, संकट में फंसा है

संदर्भग्रंथ सूची: रेख़्ता डिक्शनरी में उपयोग किये गये स्रोतों की सूची देखें .

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