गए जोबन भटार
जवानी चले जाने के बाद पति और समय बीत जाने के बाद, ज़रूरत की चीज़ मिलने का क्या फ़ायदा
गए कटक, रहे अटक
यह कहावत उस अवसर पर बोलते हैं जब किसी के वापस आने की आशा बहुत कम हो
गंगा किस की खुदाई है
उस के संबंंध में कहते हैं जो अपने धन एवं समपत्ति पर घमंड करे या ताक़त एवं बल की बात करे
गँवार गन्ना न दे भेली दे
गंवार सहज में गन्ना नहीं देता, पर धमकाने से गुड़ दे देता है, आसानी से मूर्ख कोई चीज़ नहीं देता।
गँवार गनों का यार
स्वार्थी उद्देश्य का मित्र होता है, गंवार भी अपना उद्देश्य देखता है
गँवर बुध भेड़ चाल
बगै़र सोचे समझे दूसरों की देखा देखी कोई काम करने या अंधा धुंद तक़लीद करने के मौक़ा पर कहते हैं
गाए न आवे बछवे लाज
माँ को बेटे की शरम नहीं होती अथवा इसका यह अर्थ भी हो सकता है कि माँ को तो लाज नहीं आती परंतु बेटा लज्जित हो रहा है
गाँडू का हिमायती भी हारा है
(अश्लील बाज़ारू) कम धैर्य और नपुंसक का पक्षधर भी अपमान उठाता है, बेकार का साथी भी शर्मिंदगी उठाता है, नालायक़ और नीच का साथ देना मूर्खता में शामिल है
गाँव बसते भूतना शहर बसते देव
गांव में भुतने बस्ते हैं और शहर में देव, देहातियों की शरारतों और झगड़ों पर तंज़ है गन॒वार लड़ते झगड़ते रहते हैं मगर शहर वाले तहम्मुल से रहते हैं
गाँव भागे पघिया लागे
फ़सल पक्की है और गान॒ो वाले ग़ैर हाज़िर हैं, ज़रूरत के वक़्त कोई मौजूद नहीं , ज़मींदारों की लापरवाई के लिए तंज़न कहते हैं
गाँव डूबा जाए सवाने की लड़ाई
ज़मीन॒दार मामूली झगड़ों में बहुत सा रुपया लगा देते हैं, ज़मींदार फ़ुज़ूल झगड़ों में पड़े रहते हैं और गान॒ो बर्बाद होता है
गाँव गए की बात है
बाहर जाने पर क्या काम लग जाए एवं कब लौटें इस तरह का भाव प्रकट करने के लिए कहावत है
गाँव गया सोता जागे
जिस प्रकार सोए हुए का पता नहीं कब जागेगा उसी प्रकार यात्री के लौटने का कोई पता नहीं होता
गाँव का जोगी जोगना अन गाँव का सिध
वतन में इंसान की क़दर नहीं होती, वतन से बाहर होती है, अपनी चीज़ की क़दर नहीं होती, अपनों की निसबत ग़ैरों की क़दर-ओ-मंजिलत ज़्यादा होती है
गाँव में धोबी का छैल
गाँव में धोबी का लड़का ही उतसुक बना फिरता है, क्योंकि उस का बाप शहर वालों के जो कपड़े धोने लाता है, वह उन्हें पहनता है, जो गाँव वालों को देखने को नहीं मिलते,
धोबी का बेटा गाँव में सब से अच्छे कपड़े पहनता है, क्योंकि उस के कपड़े उजले होते हैं
गाऊँ न गाऊँ बिरह गाऊँ
अव़्वल तो गांवगा नहीं अगर गांवगा तो हिजर का गीत, अव़्वल तो कोई काम नहीं करता और अगर करता है तो नुक़्सानदेह, इस से जब होगी बेवक़ूफ़ी होगी
गाऊँ न गाऊँ बिरहा गाऊँ
अव़्वल तो गांवगा नहीं अगर गांवगा तो हिजर का गीत, अव़्वल तो कोई काम नहीं करता और अगर करता है तो नुक़्सानदेह, इस से जब होगी बेवक़ूफ़ी होगी
गाऊँ ना गाऊँ बिरहा गाऊँ
अव़्वल तो गांवगा नहीं अगर गांवगा तो हिजर का गीत, अव़्वल तो कोई काम नहीं करता और अगर करता है तो नुक़्सानदेह, इस से जब होगी बेवक़ूफ़ी होगी
गाहक और मौत का पता नहीं कब आ जाए
ग्राहक और मृत्यु किसी समय भी आ सकते हैं इसलिए सदैव तैय्यार रहना चाहिए, दोनों के आने का कोई वक़्त नहीं, किसी वक़्त आ जाएँ, ये दोनों कभी भी आ सकते हैं इनके विषय में कुछ भी निश्चित नहीं
गाली और भात खाने के वास्ते हैं
जब कोई सहनशीलता या कायरता के कारण दुर्वचन का जवाब नहीं देता है तो हँसी हँसी में कहा जाता है कि गाली खाने के लिए ही होती है
गाव आमद ख़र रफ़्त
गाव आमद-ओ-ख़र रफ़त दरअसल मशहूर मिसरा मारा चह अज़ीं क़िस्सा कि गाव आमद-ओ-ख़र रफ़त का एक जुज़ु है और लाताल्लुक़ी ज़ाहिर करने के मौक़ा पर बोला जाता है
गाय का लवारा मर गया तो खलड़ा देख पन्हाई
अगर गाय का बच्चा मर जाता है तो इस की खाल में भुस भर कर गाय के पास खड़ा कर देते हैं और वो अपने थनों में दूध उतार देती है , असल ना हो तो नक़ल से काम लिया जाता है
गदागर तवाज़ो' कुनद ख़ूए ओस्त
तवाज़ो करना फ़क़ीर की आदत है, फ़क़ीर अगर आजिज़ी या इनकिसारी से काम लेता है तो ये उस की आदत है किसी से डर कर नहीं करता
गधा बरसात में भूका मरे
मूर्ख व्यक्ति अपनी मूर्खता के कारण भूका मरता है, दुर्भाग्यवान व्यक्ति को तब भी कुछ नहीं मिलता है जब हर किसी के पास सब कुछ होता है
गधा गया तो गया रस्सी भी ले गया
बड़े नुक़्सान की पर्वा नहीं छोटे नुक़्सान का अफ़सोस है , एक नुक़्सान तो हुआ था, उस की वजह से दूसरा भी हुआ, चीज़ भी गई और दूसरा नुक़्सान भी हुआ
गधा खरसा में मोटा होता है
मुर्ख दुख के समय ख़ुश होता है और ख़ुशी में दुखी होता है, मुर्ख निर्धनता में भी दुबला नहीं होता, मूर्खों को बुरी परिस्थितियों की परवाह नहीं होती
गधा क्या जाने ज़ा'फ़रान की क़द्र
नालायक़, अक्षम और बेवक़ूफ़ को अच्छी चीज़ या बहुमूल्य सामान की क़द्र नहीं होती, अज्ञानी शख़्स किसी चीज़ का वास्तविक महत्त्व क्या जाने
गधे के सर से सींग
किसी चीज़ का सिरे से ख़त्म हो जाना, ऐसे ग़ायब होना कि कभी थे ही नहीं, बिल्कुल न होना की जगह प्रयुक्त
गहनों में गहना पीतल की नथ
गहने हैं तो वो भी पीतल के और एक नथ; अर्थात: हर चीज़ बिलकुल महत्वहीन और मूल्यरहित; कुल मिलाकर यही है इसलिए यह बेकार है, बहुत ग़रीब हैं
ग़ैर की दहलीज़ और रोटी कड़वी
दूसरों के यहां रहना और उन के टुकड़ों पर बसर करना दोनों ही तकलीफ़देह हैं, ग़ैर जगह आराम नहीं मिलता, दूसरे का एहसास उठाना मुश्किल है
गला-या-तला
वेश्या अगर व्यभिचार करना शुरू कर दे तो अच्छा गाना नहीं गा सकती
ग़म न दारी बुज़ ब-ख़र
फ़ारसी कहावत उर्दू में मुस्तामल, अगर तुझे कोई ग़म नहीं तो बिक्री ख़रीद ले, ख़्वाहमख़्वाह का ऐसा काम अपने सरलीना जो फिक्रो तरद्दुद का बाइस हो, बेकार रंज-ओ-अलम पालना
ग़म न दारी बुज़ ब-ख़र
फ़ारसी कहावत उर्दू में मुस्तामल, अगर तुझे कोई ग़म नहीं तो बिक्री ख़रीद ले, ख़्वाहमख़्वाह का ऐसा काम अपने सरलीना जो फिक्रो तरद्दुद का बाइस हो, बेकार रंज-ओ-अलम पालना
गंदुम अगर बहम न-रसद भुस ग़नीमत अस्त
बड़ा फ़ायदा हासिल ना हो तो थोड़ा फ़ायदा ही सही, अच्छी चीज़ मयस्सर ना हो तो मामूली चीज़ ही ग़नीमत है, असल चीज़ हासिल ना कर किसे तो खिसयाना हो कर किसी और चीज़ पर इकतिफ़ा कर लेने के मौक़ा पर बोलते हैं
गंदुम अगर बहम न-रसद जौ ग़नीमत अस्त
बड़ा फ़ायदा हासिल ना हो तो थोड़ा फ़ायदा ही सही, अच्छी चीज़ मयस्सर ना हो तो मामूली चीज़ ही ग़नीमत है, असल चीज़ हासिल ना कर किसे तो खिसयाना हो कर किसी और चीज़ पर इकतिफ़ा कर लेने के मौक़ा पर बोलते हैं
गंगा भी जाए कलवारन छाती पीटे
कलवारों पर तंज़ है कि इतना पानी ज़ाए होरहा है काश वो शराब में मिला कर बेचती , किसी को फ़ायदा हो तो बख़ील को दुख होता है , लालची हर चीज़ ख़ुद लेना चाहा है
गंगा भी जाए कलवावल छाती पीटे
कलवारों पर तंज़ है कि इतना पानी ज़ाए होरहा है काश वो शराब में मिला कर बेचती , किसी को फ़ायदा हो तो बख़ील को दुख होता है , लालची हर चीज़ ख़ुद लेना चाहा है
गरजते हैं सो बरस्ते नहीं
शोर करने वाला कोई काम नहीं करसकता, शेखी बाज़ों की बातें ही बातें हुआ करती हैं, लाफ ज़न कुछ नहीं कर सकता, जो डींगें मारते हैं वो करते कुछ नहीं
ग़रज़ बावली होती है
ज़रूरतमंद आदमी पागल होता है, वह अपनी इच्छा की पूर्ति के लिए कुछ भी करने से नहीं हिचकिचाता, इच्छुक को बस अपना काम सूझता है, अर्थात आवश्यकता उसे अंधा बना देती है
गर्भ का सर नीचा
घमंडी का सर नीचा, अहंकार का अंत अपमान है, अहंकार करने वाला अंत में अपमानित होता है
गर्भ करते रावन हारे
अहंकारी व्यक्ति अंततः अपमानित होता है, ग़ुरूर करने वाला आख़िर में ज़लील होता है
गठरी हलाल बुक़्चा हराम
मामूली मसले में रास्त बाज़ी और अहम मसले में बेईमानी, थोड़ी चीज़ में रास्त बाज़ी, बड़ी चीज़ में बेईमानी
गवाह चुस्त, मुद्द'ई सुस्त
उस अवसर पर बोलते हैं जब स्व-इच्छुक व्यक्ति सुस्त होता है और उसके आस-पास के लोग उसका समर्थन करते हैं और और भरपूर कोशिश करते हैं
गया वक़्त फिर हाथ आता नहीं
(प्रसिद्ध कवि मीर हसन की कविता का एक श्लोक कहावत के रूप में प्रयोग किया जाता है) जो मौक़ा हाथ से निकल जाये वो फिर हाथ नहीं आता, पछतावा और अफ़सोस रह जाता है
गज़ दो फ़ाख़्ता
एक तीर से दो निशाने, एक तीर से दो शिकार, एक काम से दो फ़ायदे (एक इक़दाम से दो मक़सद पूरे होने के मौक़ा पर मुस्तामल)
घड़े कुम्हार, बरते संसार
साधारण व्यक्ति के काम से सारी दुनिया फ़ायदा उठाती है, एक आदमी काम करता है और बहुत से लोग फ़ायदा उठाते हैं
घड़ी में घड़ियाल है
पल भर में कुछ से कुछ हो जाता है, समय का हाल बदलते देर नहीं लगती; मर जाने में देर नहीं लगती
घड़ी में कुछ घड़ी में कुछ
जिसका चित्त स्थिर न हो और छोटी सी बात पर प्रसन्न और छोटी सी बात पर अप्रसन्न हो जाए, घड़ी में तौला घड़ी में माशा, पल में तौला पल में माशा, कभी कुछ और कभी कुछ
घाँटी तले माँटी
मालिक हर वक़्त काम करवाता है, गले से नीचे खाने का कोई मज़ा नहीं होता
घास खाए दिन कटे तो सब कोई खाए
यदि रूखी सुखी खाने से बहुत हो जाए तो कोई परिश्रम सहन नहीं करेगा, यदि छोटी-छोटी बेकार बातों /वस्तुओं से जीवन आराम से व्यतीत हो जाए तो सभी लोग आराम से रहें
घास खाओ
जब कोई गाहक बहुत सस्ती चीज़ माँगे, तो दुकानदार उसके जवाब में कहता है, मतलब यह होता है कि तो इसकी क़द्र क्या जाने
घबराई डोमनी फिर सुहेले गाए
घबराहट में अक़ल ठिकाने नहीं रहती यानी जब डोमनी गाते गाते या बैल लेते लेते घबरा जाती है तो हर फिर कर एक ही गीत गाने लगती है और उसे ये भी ख़बर नहीं होती कि अभी तो में इस गीत कोगा चुकी हूँ
घर आए पीर न पूजे बाहर पूजन जा
क़ाबू के वक़्त काम न करे फिर योजना बनाता फिरे, समय पर काम न करना फिर योजना करते फिरना, घर आई दौलत को छोड़कर दूसरी जगह तलाश करना
घर बैठे आधा भला
घर की आधी भली, घर बैठ कर आराम से होने वाली थोड़ी आय भी अच्छी है
घर बयाना दिया
(तंज़िया) मुनासिब और मौज़ून शख़्स से मुआमला नहीं किया
घर बियाह और बहू पपलियों
सख़्त बदइंतिज़ामी है , बे मौक़ा की ख़ुशी के वक़्त मुस्तामल या जब माँबाप चयन करें और औलाद मुसीबत भुगते उस वक़्त बोलते हैं
घर दूर भरोटा भारी
घर दूर है और बोझ बहुत है, अधिक मुश्किल या बड़ी मुसीबत के वक़्त बोलते हैं
घर घोड़ा, नख़्ख़ास मोल
(लखनऊ) घोड़ा तो घर पर है और बाज़ार (नख़्ख़ास) उसका मोल करते हैं, वस्तु तो घर में है, बिना माल दिखाए ही उसका दाम कहने पर कहते हैं
घर जले घूर बता दे
घर तो जल रहा है और कहता है कि धुआँ है, अपने आपको या दूसरे को धोखे में रखना
घर का भेदी लंका ढाए
राज़दार या भेद जानने वाले की शत्रुता अति घातक होती है, उस समय कहते हैं जब कोई राज़दार मुसीबत खड़ी कर दे, रामायण की घटना की ओर संकेत है जिस में रावण ने राम को रावण को हराने का भेद बता दिया था
घर का जोगी जोगना, बाहर का जोगी सिद्ध
मनुष्य को अपने मातृभूमि में महत्व नहीं दिया जाता है, इंसान की वतन में क़दर नहीं होती, अपने गाँव में फ़क़ीर होता है दूसरे गाँव में औलिया समझा जाता है
घर के पीरों को तेल का मलीदा
अपनों को अप्रतिष्ठित या असम्मानित और दुसरों का सम्मान करना, हक़दारों के साथ अच्छा व्यवहार न करना और दूसरों की आवभगत करना
घर की मुर्ग़ी दाल बराबर
घर की सब से अच्छी वस्तु का घर में ही मूल्य नहीं, आसानी से मिलने वाली वस्तु का कोई मूल्य नहीं, जो कुछ अपने पास है उस का महत्व नहीं होता
घर की पुटकी बासी साग
घर में देखो तो मिट्टी के बर्तन और बासी साग के सिवा कुछ न निकलेगा बाहर केवल शेख़ी ही शेख़ी है
घर में शेर बाहर भेड़
इस व्यक्ति के बारे में कहते हैं जो घर वालों पर तो धाक जमाए और रोब दिखाए, लेकिन बाहर वालों से दब जाए, घर वालों पर अकारण ही सख़्ती करने और बाहरवालों से कोमल आचरण रखने वाला
घर न होना
आपस में निबाह होना, पारिवारिक व्यवस्था न होना, ख़ानादारी का इंतिज़ाम ना होना
घर से आए हैं संदेसा लाए हैं
जब किसी शख़्स पर कुछ बनी हो और इस से ज़्यादा सर गुज़शता दूसरा आदमी उस को सुनाना चाहे तो उस वक़्त वो ये फ़िक़रा कहते हैं तुम मुझ से ज़्यादा वाकिफ-ए-हाल नहीं हो, कोई ग़ैर मुताल्लिक़ शख़्स दख़ल दे तो कहते हैं
घर यार के, पूत भतार के
यह कहावत विलासी आदमी के सम्बन्ध में कहते हैं जिस के बच्चे वेश्या के यहां होते हैं और अपना कोई रहने का स्थान नहीं होता
घर, घोड़ा, गाड़ी, इन तीनों के दाम खड़ा-खड़ी
घर, घोड़ा और गाड़ी इन तीनों के दाम नक़द ले लेने चाहिए, इनके उधार बेचने में बहुत परेशानी होती है एवं ये तीनों चीज़ें अपने स्थान पर ही बिकती हैं, अर्थात जहाँ वे देखी जा सकें
घी जाट का और तेल हाट का
घी गाँव से मँगवाया हुआ और तेल तेली की दूकान से लिया हुआ अच्छा होता है, क्योंकि गाँव का घी ताज़ा होता है और दूकान पर तेल कई दिन का होने के कारण साफ़ मिलता है
घी खिचड़ी में दा'वा है
यह कहावत उस के संबंध में कहते हैं जिसे बहुत कुछ मिल जाए फिर भी अधिक का दावा करे, घर की स्वामित्व चाहते हैं
घोड़ा घास से आश्नाई करे तो भूका मरे
मुआमले की जगह मुरव्वत बरतने से नफ़ा नहीं होता, कोई शख़्स अगर अपने काम के नफ़ा की कुछ पर्वा ना करे तो गुज़ारा नामुमकिन है , मज़दूर मज़दूर ना ले तो भूका मर जाये , अपना मतलब कोई नहीं छोड़ता
घोड़ा घास से आश्नाई करेगा तो खाएगा क्या
मुआमले की जगह मुरव्वत बरतने से नफ़ा नहीं होता, कोई शख़्स अगर अपने काम के नफ़ा की कुछ पर्वा ना करे तो गुज़ारा नामुमकिन है , मज़दूर मज़दूर ना ले तो भूका मर जाये , अपना मतलब कोई नहीं छोड़ता
घोड़ी भुसेले ही में दम लेगी
घोड़ी पर फिर कर अपने अड्डे या जाये सुकूनत ही पर आजाएगी , उस शख़्स के बारे में बोलते हैं जो घर से ज़्यादा दिन दूर ना रह सके
घोड़ी को घर क्या दूर है
घोड़े के आगे फ़ासिला और दूरी कुछ चीज़ नहीं, काम जानने वाले के लिए कोई काम मुश्किल नहीं, चतुर व्यक्ति अपना मतलब जल्दी निकाल लेता है, चालाक शख़्स अपना मतलब जल्द निकाल लेता है
घोड़ी को लात आदमी को बात
बेवक़ूफ़ को मार-पीट की ज़रूरत होती है पर बुद्धिमान के लिए इशारा ही काफ़ी है, घोड़े को तंग और आदमी को शर्म
घोड़ी फैंसे की लाग
घोड़ा और भैंसा जब भी मिलेंगे लड़ाई ज़रूर होगी, सख़्त दुश्मनी के लिए कहते हैं
घोड़ों को घर कितनी दूर
घोड़ों के लिए दूरी का कोई महत्व नहीं, काम करने वाले के लिए सब कुछ आसान है, बहाना करना व्यर्थ है
घोड़ों राज बैलों अनाज
शासन सेना के माध्यम और अनाज की पैदावार कृषि के माध्यम से होती है, हुकूमत फ़ौज के ज़रिये और अनाज की पैदावार खेती बाड़ी के ज़रिये होती है
घूँसों का उधार क्या
घूओंसों में मारने की जगह फ़ौरन मारना चाहे तवक्कुफ़ अच्छा नहीं, इंतिक़ाम फ़ौरन लेना चाहिए, जुर्म की सज़ा फ़ौरन मिलनी चाहिए
गिलहरी का ठिकाना पेड़
हर एक व्यक्ति का ठिकाना निर्धारित है, हर एक व्यक्ति शांति और चैन का स्थान ढूँढता है, हर एक व्यक्ति अपने आराम का स्थान ढूँढता है
गिनी बोटी नपा शोरबा
ऐसे मौक़ा पर बोलते हैं जब क़लील आमदनी की वजह से बहुत खींच तान के ख़र्च पूरा क्यू जाये या कंजूसी के साथ ख़र्च किया जाये , सिर्फ़ गुज़ारे के काबिल आमदनी
गोली अंदर, दम बाहर
नियम हकीमों की दवाओं के मुताल्लिक़ कहते हैं , नीम हकीम या अनाड़ी की दवा इंसान को मार सकती है
गुड़ खाएँ गुलगुलों से परहेज़
जब कोई एक बुरा काम करे और उसी तरह के दूसरे बुरे काम से परहेज़ करे तो व्यंग में ऐसा कहते हैं, बड़ी बदनामी का विचार न करना छोटी से परहेज़ करना, बड़ी बुराई की परवाह न करना और छोटी से बचना
गुड़ की जूती
जब किसी चीज़ के नायाब होने पर ग़रीब लोग उस की शक्ल तक देखने को तरसें मगर अमीर लोग उसे बेतहाशा इस्तिमाल करें तो इस मौक़ा पर कहते हैं
गुदड़ी में लाल नहीं छुपता
बुरों में अच्छा नहीं छुपता, सौ पर्दों में भी अच्छी चीज़ दिखाई देती है, योग्य आदमी अपनी योग्यता हर जगह मनवा लेता है
गुह की दारू मूत
जैसा गुनाह होता है क़ाबू पाने पर वैसी ही उस की सज़ा दी जाती है
गुंजी कबूतरी, महलों में डेरा
अयोग्य आदमी को ऊँचा स्थान मिलना, अभागे और भद्दे मनुष्य का ये रुतबा, अयोग्य आदमी को ऊँचा स्थान मिलने के संबंध में कहावत
गुर गुर बिद्या, सुर सुर ज्ञान
हर गुरु का जुदागाना इलम-ओ-अमल और हर एक सर में मुख़्तलिफ़ अक़ल और हर शख़्स की राय अलग होती है , हर उस्ताद के सिखाने का तरीक़ा अलग होता है और हर इंसान की अक़ल मुख़्तलिफ़ होती है
गू का पूत नोसादर
सग-ए-ज़र्द बिरादर-ए-शगाल दोनों एक ही हैं, दो बुरी बातों या बुरे शख्सों की मुसावात ज़ाहिर करने के मौक़ा पर बोलते हैं
गू नहीं, छी छी
थोड़ा अपमान हो या अधिक, दोनों तरह से अपमान में कोई अंतर नहीं, शब्दों से क्या होता है बात तो एक ही है, बुरी वस्तु हर हालत में बुरी ही रहेगी, नाम बदलने से उस का गुण नहीं बदलता
गू से निकल कर मूत में गिरे
वहीं रुके रहे, कोई फर्क नहीं पड़ा, एक कॉल से निकले और दूसरी कॉल में गिरफ्तार हो गए, जब कोई व्यक्ति किसी बुरी परिस्थिति से निकलकर वैसी ही बुरी परिस्थिति में फंस जाता है तो कहते हैं
गूड़ खाएँ गुलगुलों से परहेज़
जिस बात या जिस चीज़ को एक सूरत में नापसंद करें उसी को दूसरी सूरत में क़बूल करलीं, शोरबा हलाल बूटी हराम, बड़ी बात को करना और छोटी से परहेज़ करना, बड़ी बदनामी का ख़्याल ना करना छोटी से परहेज़ करना, अदना बुराई से बचना और बड़ी बुराई करना , बड़ों से मिलना और छोटों से दूर रहना
गूइठा जले गोबर हाँसे
उस मूर्ख के बारे में कहा गया है जो दूसरों की हानि पर हंसता है, भले ही उसकी अपनी हानि भी उतनी ही होने की संभावना हो
गूइठा जले उपला हाँसे
बेवक़ूफ़ के मुताल्लिक़ कहते हैं जो दूसरों के नुक़्सान पर हँसता है हालाँकि इस का अपना नुक़्सान भी इसी तरह होने वाला होता है
गूदड़ में लाल नहीं छुपता
योग्य व्यक्ति को प्रसिद्धि मिल ही जाती है, क़ाबिल आदमी चाहे ग़रीब ही हो शोहरत पा जाता है, सच्चाई छुप नहीं सकती
गूह की तरह छुपाना
मुराद : बिल्ली के गो की तरह छुपाना, पूरी तरह छुपाना, ढाँकते फिरना , कमाल एहतियात से रखना
गूह नहीं छी छी
बुराई या अपमान में कोई अंतर नहीं है, किसी की थोड़ी ज़िल्लत और हल्के अपमान पर बोलते हैं
गुज़श्त-आँचा-गुज़श्त
(फ़ारसी कहावत उर्दू में मुस्तामल)जो कुछ हुआ सौ हुआ, जो कुछ गुज़रना था सौ गुज़र गया, जो होना था होगया अब इस का क्या ज़िक्र यानी माज़ी पर अफ़सोस करना लाहासिल है